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पश्चिम बंगाल में कांग्रेस से नफरत, फिर दिल्ली में ममता बनर्जी को राहुल गांधी पर अचानक क्यों उमड़ा प्यार?

संवाददाता

नई दिल्ली। इंडिया ब्लॉक की आधी-अधूरी बैठक का लब्बोलुआब कोई खास उत्साहजनक नहीं रहा. इसलिए कि महाराष्ट्र में राज कर चुके उद्धव ठाकरे और उत्तर प्रदेश के सीएम रहे अखिलेश यादव की भौतिक उपस्थति नहीं हो पाई. वे ऑनलाइन तरीके से बैठक से जुड़े. अलबत्ता पश्चिम बंगाल की पूर्व सीएम हो चुकीं ममता बनर्जी अपने भतीजे सांसद अभिषेक बनर्जी के साथ बैठक में हिस्सा लेने के लिेए जरूर ससमय दिल्ली पहुंचीं. बैठक का एजेंडा पहले से ही स्पष्ट था कि चुनाव आयोग के SIR (विशेष मतदाता पुनरीक्षण) और मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ हल्ला बोल की रणनीति बनानी है. रणनीति बनी भी. अक्टूबर-नवंबर में रैलियों की संख्या और तारीखें तय हुईं. अघोषित एक ऐसे मुद्दे पर भी बैठक में सांकेतिक अंदाज में चर्चा हुई कि बना किसी हील हवाले के आंख मूंद कर विपक्ष राहुल गांधी को प्रधानमंत्री का चेहरा स्वीकार कर ले.

दूसरे दलों को तो कभी इस पर कोई आपत्ति नहीं रही है, लेकिन तृणमूल कांग्रेस की नेता और पश्चिम बंगाल की पूर्व सीएम ममता बनर्जी जरूर पहले इस मुद्दे पर नाक-भौं सिकोड़ती रही हैं. सीधे, सरल और सपाट शब्दों में कहें तो उन्हें राहुल गांधी और काग्रेस से हमेशा बेपटरी रही है.

ममता को राहुल और कांग्रेस कबूल

ममता बनर्जी का मन आश्चर्यजनक ढंग से अब बदल गया है. राहुल गांधी का नेतृत्व स्वीकार करने में इस बार वे सबसे आगे रहीं. बैठक में उनकी बेबसी भी साफ दिखी. उन्होंने इसका जिक्र इस रूप में किया कि उनके लिए सबको मिल कर कुछ करना चाहिए. बंगाल में पहली बार बनी भाजपा सरकार ने उनकी नाक में दम कर दिया है. उन्हें और उनके साथ बचे-खुचे नेताओं को नजरबंदी की स्थिति में ला दिया गया है. इसी क्रम में उन्होंने राहुल को बेहिचक विपक्षी गठबंधन का नेता बने रहने पर सहमति भी जता दी. ममता के रुख में अचानक आए इस बदलाव में विपक्षी एकता से अधक उनकी मजबूरी झलकती है.
यह सर्वविदित है कि कांग्रेस से ममता बनर्जी के रिश्ते पहले कैसे रहे हैं. यद्यपि कि वे कांग्रेस की ही उपज हैं. उनका राजनीतिक करियर कांग्रेस से ही शुरू हुआ था, लेकिन बाद में रिश्ते ऐसे बिगड़े कि वे न सिर्फ अलग हुईं, बल्कि अपनी अलग पार्टी टीएमसी का गठन किया. उनकी नजर में कांग्रेस भी उतनी ही अछूत रही है, जितने वाम दल. कांग्रेस से अलग होने के बाद वे कुछ समय तक भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए का हिस्सा रहीं. कांग्रेस के साथ एक बार गठबंधन का विधानसभा का चुनाव जरूर लड़ा, लेकिन अगले ही चुनाव में उन्होंने ब्रेकअप कर लिया. कांग्रेस को हटा कर सत्ता हासिल करने वाले वाम दलों से उनकी बेपटरी तो पहले से ही थी.

कांग्रेस की जड़ में मट्ठा डालती रहीं

कांग्रेस के लिए 2021 का बंगाल विधानसभा चुनाव यादगार रहा. विपक्षी एकता की सुगबुगाहट के बावजूद विधानसभा चुनाव में टीएमसी ने कांग्रेस से समझौता नहीं किया. नतीजा यह हुआ कि विधानसभा में कांग्रेस शून्य हो गई. वामपंथी दलों से तालमेल कार उपचुनाव में कांग्रेस का एक विधायक जीता भी तो ममता ने उसे टिकने नहीं दिया. उसे अपनी पार्टी में शामिल करा लिया. यह काम उनके लिए इसलिए भी आसान हुआ कि एक ही विधायक होने के कारण दल-बदल का कोई लफड़ा ही नहीं था. यही नहीं, 2024 लोकसभा चुनाव में विपक्षी एकता की बात परवान चढ़ने के बावजूद ममता ने बंगाल में कांग्रेस से कोई समझोता नहीं किया. कांग्रेस ताकती रह गई.

गैर कांग्रेस विपक्षी एकता की पहल

बंगाल विधानसभा चुनाव 2021 में भाजपा की लाख कोशिश के बावजूद जीत की हैट्रिक के बाद ममता बनर्जी को यह लगने लगा कि केंद्र से भी भाजपा को भगाया जा सकता है. विपक्ष की बड़ी पार्टियां भी उनमें भाजपा के प्रबल प्रतिरोध की छवि देखने लगी थीं. वे कांग्रेस विहीन विपक्षी एकता की पक्षधर थीं. इसके लिए ममता ने प्रयास भी शुरू कर दिए. वे महाराष्ट्र गईं. वहां उद्धव ठाकरे और शरद पवार जैसे भाजपा विरोधी बड़े नेताओं से मिलीं. अखिलेश यादव से उनका याराना सभी जानते हैं. कई बार बंगाल दौरे पर जाने पर अखिलेश ने उनसे गुफ्तगू की. ममता को भी लगने लगा कि राष्ट्रीय राजनीति में उतर कर वे प्रधानमंत्री की सशक्त दावेदार बन सकती हैं. हालांकि शरद पवार ने यह कह कर उनका सारा खेल बिगाड़ दिया कि कांग्रेस को छोड़ कर विपक्षी एकता की बात बेमानी है.

राहुल के नेतृत्व पर सवाल उठाया

सबसे दिलचस्प पहलू यह रहा कि 2024 लोकसभा चुनाव में विपक्ष की हार के बाद ममता ने राहुल गांधी के नेतृत्व पर ही सवाल उठा दिया. यहां तक कि उन्होंने खुद इंडिया ब्लाक का नेतृत्व करने की इच्छा जताई. तब समावादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव, राष्ट्रीय जनता के राष्ट्रीय अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव और इंडिया ब्लाक के कई अन्य नेताओं ने ममता के प्रस्ताव का समर्थन कर दिया. जाहिरा तौर पर यह ममता के लिए यह उत्साहित करने वाली बात थी. कांग्रेस हालात का अंदाजा लगा कर खामोश रही. हालांकि कर्नाटक, हिमाचल प्रदेश और तेलंगाना में जीत के बाद कांग्रेस के पुनरुत्थान की संभावना दिखाई देने लगी. राहुल गांधी की यात्राओं को कारगर माना जाने लगा. इसका कुछ असर 2024 के लोकसभा चुनाव में दिखा भी. भाजपा को पिछली बार जीतीं 303 सीटों से खिसक कर 240 पर सिमट जाना पड़ा.

ममता के CM न रहने से पूछ घटी

सरकार गंवाने के बाद ममता की पूछ घटी है. प्रभाव भी अब पहले जैसा नहीं रहा. उनके 80 में करीब 60 विधयक और 29 में 20 सांसद साथ छोड़ चुके हैं. वे बंगाल में भी अलोकप्रिय होती जा रही हैं. जहां भी जाती हैं, उन्हें विरोध का सामना करना पड़ता है. हालांकि वे दावा करती हैं कि यह सब भाजपा सरकार द्वारा प्रायोजित है. पर, बंगाल का राजनीतिक इतिहास पर नजर डालें तो पहले से ही ऐसा होता रहा है. जब कोई पार्टी सत्ताच्यूत होती है तो उसकी यही गति होती है. ममता ने वाम दलों को पराजित किया तो उनके साथ भी ऐसा ही सलूक हुआ था. वे आज भी इसके लिए ममता को कोसते हैं. जब भी विपक्षी एकता की बात होती है तो बंगाल के वामपंथी बिदक जाते हैं. उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर दोस्ती में तो हिचक नहीं होती, लेकिन बंगाल में ममता की टीएमसी से कुश्ती वे छोड़ने को तैयार नहीं होते.

 

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