संवाददाता
लखनऊ। उत्तर प्रदेश में भले ही बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो मायावती कई सालों से एक मजबूत और प्रभावशाली महिला नेता बनी हुई हैं, लेकिन पिछले कुछ चुनावों से वह राजनीतिक ढलान पर चली गई हैं. इसके बाद उत्तर प्रदेश की आधी आबादी यानी महिला मतदाताओं को अपने पाले में करने की होड़ सभी प्रमुख दलों में मच गई है. यूपी चुनाव 2027 में डिंपल यादव, इकरा हसन चौधरी, प्रिया सरोज, अपर्णा यादव और अनुप्रिया पटेल जैसे पांच महिला चेहरे सियासी समीकरणों को बदलने का दम रखते हैं. लेकिन, बीजेपी ने पूर्व केंद्रीय मंत्री और हाल ही में संगठन में बड़ी जिम्मेदारी संभालने वाली स्मृति ईरानी अपने आक्रामक अंदाज, लंबे प्रशासनिक अनुभव और बेबाक भाषण शैली पर इन सभी चेहरों पर भारी पड़ सकती है. आइए जानते हैं स्मृति ईरानी के मुकाबले डिंपल यादव, इकरा हसन चौधरी, प्रिया सरोज, अपर्णा यादव और अनुप्रिया पटेल कहां ठहरती हैं?
डिंपल यादव की ताकत और कमजोरी

यूपी चुनाव 2027 में इन 5 महिला चेहरों की ताकत, कमजोरी और मास लीडर बनने में अब जंग शुरू होने वाली है. अगर स्मृति ईरानी से डिंपल यादव की तुलना करें तो अखिलेश यादव की पत्नी होने के नाते समाजवादी पार्टी के समर्थकों और कैडर में उनकी स्वीकार्यता बेहद सहज है. मैनपुरी उपचुनाव और 2024 के लोकसभा चुनाव में भारी अंतर से जीतकर उन्होंने अपनी राजनीतिक परिपक्वता और सौम्य छवि की बदौलत अपनी स्वतंत्र पहचान बनाई है. लेकिन भाषण शैली में बहुत अधिक आक्रामकता का न होना और केवल चुनिंदा मौकों पर ही मीडिया या रैलियों में सक्रिय दिखना उन्हें कमजोर बनाती है. वे सपा महिला विंग के लिए एक बड़ा चेहरा हैं, लेकिन उनकी पहुंच मुख्य रूप से सपा के पारंपरिक यादव-ओबीसी वोट बैंक तक सीमित मानी जाती है.
इकरा हसन चौधरी की बेबाकी

लंदन से पढ़ी-लिखी युवा नेता इकरा हसन ने पश्चिम उत्तर प्रदेश की कैराना सीट पर अपनी मजबूत पकड़ बनाई है. वे हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण के बीच भी सर्वसमाज को साथ लेकर चलने वाला भाषण देती हैं, जिससे वे युवाओं और महिलाओं के बीच तेजी से लोकप्रिय हुई हैं. लेकिन उनका प्रभाव फिलहाल केवल पश्चिमी यूपी शामली, मुजफ्फरनगर, सहारनपुर के कुछ जिलों तक ही सीमित है. उनमें एक नेशनल लेवल की बेबाक वक्ता बनने की पूरी क्षमता है, लेकिन पूरे यूपी में विस्तार करने के लिए उन्हें अभी लंबा सफर तय करना होगा.
प्रिया सरोज दलित चेहरा
सपा के वरिष्ठ नेता तूफानी सरोज की बेटी और क्रिकेटर की रिंकू सिंह की मंगेतर प्रिया सरोज की भी खूब चर्चा हो रही है. प्रिया सरोज दलित-पासी समुदाय का प्रतिनिधित्व करती हैं. 2024 में छोटी उम्र में सांसद बनकर उन्होंने दिखाया कि वे कैडर को साध सकती हैं. लेकिन राजनीतिक अनुभव की कमी और अभी तक कोई बड़ी संगठनात्मक या व्यापक राज्यस्तरीय पहचान न होना यूपी चुनाव में काफी खटक सकता है. मायावती के ढलान के बाद बसपा के दलित गैर-जाटव वोटों को सपा में शिफ्ट करने के लिए वे एक बेहतरीन माध्यम बन सकती हैं, लेकिन अभी वे शुरुआती दौर में हैं.
अपर्णा यादव की ताकत
मुलायम सिंह यादव के छोटे बेटे स्व. प्रतीक यादव की पत्नी होने के कारण उनका परिवारिक प्रभाव है. वे हिंदुत्व, महिला सुरक्षा और राष्ट्रवाद के मुद्दों पर बेबाकी से बोलती हैं. लेकिन सपा छोड़कर बीजेपी में आने के बाद उन्हें लंबे समय तक पार्टी में कोई बड़ा जनाधार या सीट नहीं मिली, जिससे उनका अपना व्यक्तिगत वोट बैंक काफी अनिश्चित है. जब तक वे खुद कोई बड़ा चुनाव जीतकर अपनी जमीनी पकड़ साबित नहीं करतीं, तब तक वे मास लीडर के बजाय एक मीडिया फेस के रूप में ही अधिक देखी जाती हैं.
अनुप्रिया पटेल जाति विशेष से आगे नहीं
अनुप्रिया पटेल बीते कुछ सालों से यूपी में कुर्मी समाज की निर्विवाद और स्थापित नेता के तौर पर उभरी हैं. शायद यही वजह है कि बीजेपी अपना दल को लगातार अपने साथ बनाए रखा है. अनुप्रिया पटेल का केंद्र सरकार में लगातार मंत्री रहने का अनुभव और पूर्वांचल के कई जिलों में अपना दल (एस) का कैडर आधारित वोट बैंक उनकी सबसे बड़ी पूंजी है. लेकिन उनकी राजनीति पूरी तरह से कुर्मी वोट बैंक और बीजेपी के साथ गठबंधन पर टिकी है. अकेले दम पर पूरे प्रदेश में चुनाव जिताने की क्षमता सीमित है. वे अपने समुदाय की स्थापित मास लीडर हैं, लेकिन सर्वसमाज की नेता बनने में उनकी जातीय सीमाएं आड़े आती हैं.
बीजेपी की राष्ट्रीय राजनीति में वापसी के साथ ही स्मृति ईरानी को 2027 के यूपी चुनाव के मद्देनजर संगठन और प्रचार में बड़ी जिम्मेदारी मिलने की संभावना जताई जा रही है. इन पांचों चेहरों के मुकाबले स्मृति ईरानी कई कारणों से सबसे आगे नजर आती हैं. स्मृति ईरानी उत्तर प्रदेश से लेकर पूरे देश में अपने तीखे वक्तव्य और भाषण शैली के लिए जानी जाती हैं. वे सीधे गांधी परिवार और विपक्ष पर हमला बोलने में किसी भी क्षेत्रीय नेता से ज्यादा असरदार साबित होती हैं. केंद्र में बड़े-बड़े मंत्रालयों को संभालने का उनका अनुभव उन्हें केवल एक स्टार प्रचारक ही नहीं, बल्कि नीतिगत मुद्दों पर भी गंभीर नेता बनाता है. 2019 में अमेठी से राहुल गांधी को हराने का ऐतिहासिक रिकॉर्ड उनके नाम दर्ज है. हालांकि 2024 में उन्हें अमेठी से हार का सामना करना पड़ा, लेकिन उनकी राजनीतिक वापसी और संघर्ष करने की क्षमता को बीजेपी कैडर बेहद सम्मान से देखता है.
जहां अनुप्रिया पटेल कुर्मी, डिंपल यादव यादव और इकरा हसन, प्रिया सरोज अपने-अपने क्षेत्रीय व जातीय दायरे में सिमटी हैं, वहीं स्मृति ईरानी बीजेपी के भीतर सर्व समाज और महिला राष्ट्रवाद के नैरेटिव पर पूरी तरह खरी उतरती हैं. ऐसे में 2027 के यूपी विधानसभा चुनाव में जहां विपक्षी दल अपने युवा और जातीय समीकरण वाले महिला चेहरों के भरोसे मैदान में उतरेंगे, वहीं बीजेपी स्मृति ईरानी जैसी अनुभवी और आक्रामक राष्ट्रीय नेता को आगे करके पूरे प्रदेश के महिला साइलेंट वोटर को साधने का मास्टरस्ट्रोक खेल सकती है.