संवाददाता
नई दिल्ली । नेहा बोरा कांग्रेस का नया युवा चेहरा बन रही हैं? इंडिया ब्लॉक की संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में तस्वीरें साफ थीं.गांधी परिवार उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रहे थे.राहुल गांधी बार-बार उन्हें मीडिया को संबोधित करने के लिए प्रोत्साहित कर रहे थे.
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) की युवा एआईएसए नेता के लिए यह ध्यान आकर्षित करने वाला था. कांग्रेस के लिए यह युवा मतदाताओं को अपनी ओर खींचने की नई रणनीति का संकेत हो सकता है.
जंतर मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के विरोध प्रदर्शन के बाद पार्टी के अंदर यह अहसास बढ़ रहा है कि वह युवाओं पर पकड़ खो रही है. राहुल गांधी अपनी छवि सुधारने पर काम कर रहे हैं, इंस्टाग्राम पर सक्रिय होना, ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रमों में साधारण शर्ट पहनना और संगीत तथा युवा संपर्क कार्यक्रमों के जरिए प्रभावशाली लोगों से जुड़ना. फिर भी कुछ कमी थी: एक युवा, स्पष्ट बोलने वाला चेहरा जो छात्रों से जुड़ सके और पार्टी में नई ऊर्जा ला सके.

कन्हैया कुमार एक समय इस भूमिका में फिट लगते थे. पूर्व जेएनयू छात्र नेता को एक आक्रामक और स्पष्ट बोलने वाला विकल्प माना जाता था जो राहुल गांधी की मदद से कांग्रेस को युवा बना सकता था. लेकिन चुनावी असफलताओं और दिल्ली विश्वविद्यालय चुनावों के प्रभारी के रूप में असफल रहने के बाद वे किनारे हो गए. अब नेहा बोरा कुछ हद तक वह जगह लेती दिख रही हैं.
राहुल गांधी द्वारा आयोजित इंडिया ब्लॉक की चाय पार्टी में बोरा ने ध्यान खींचा जब वे उनके बगल में बैठीं और बताया कि छात्रों और कॉलेज परिसरों को राजनीतिक चर्चा में क्यों शामिल करना जरूरी है. गांधी परिवार के करीब होना बताता है कि नेतृत्व उनके लिए बड़ी भूमिका देख रहा है.
यह बात कांग्रेस के सभी लोगों को अच्छी नहीं लगी. कुछ वरिष्ठ नेता पार्टी के बाईं ओर झुकाव से असहज हैं, खासकर बोरा के एआईएसए से जुड़ाव को लेकर, जिसे आलोचक अक्सर उग्रवादी संगठन बताते हैं. उनकी चेतावनी परिचित है: क्या वे भी कन्हैया कुमार जैसी बन जाएंगी. एक होनहार युवा चेहरा जो बाद में राजनीतिक बोझ बन जाए?
कन्हैया का कांग्रेस में उदय संदीप सिंह की मदद से हुआ था, जो पूर्व जेएनयू छात्र नेता थे और प्रियंका गांधी वाड्रा के साथ काम कर चुके थे. सिंह ने कन्हैया को गांधी परिवार के ध्यान में लाया. छात्र राजनीति पर आधारित उनके जोशीले भाषणों ने नेतृत्व को प्रभावित किया. उनका आना कांग्रेस की वामपंथ की राजनीति को अपनाने की इच्छा को भी दर्शाता था.
अब वही गणित बोरा के साथ लगाया जा रहा है. गांधी परिवार और उनकी टीम ने उनके सोशल मीडिया प्रभाव को नोटिस किया है और मानती है कि वे पार्टी को न सिर्फ दिल्ली बल्कि उससे आगे युवा मतदाताओं से जोड़ने में मदद कर सकती हैं. बोरा की उत्तराखंड जड़ें भी कांग्रेस के लिए उपयोगी साबित हो सकती हैं क्योंकि पार्टी राज्य के चुनावों की ओर देख रही है.
लेकिन इस राजनीतिक अवसर के साथ एक जटिलता भी है. बोरा ने उमर खालिद की रिहाई की जोरदार वकालत की है. अगर वे कांग्रेस के अभियानों का प्रमुख चेहरा बनती हैं तो भाजपा इस जुड़ाव का इस्तेमाल करके पार्टी पर उन लोगों के प्रति नरम होने का आरोप लगा सकती है जिन्हें वह राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बताती है. वही लाइन जो उसने पहले कन्हैया कुमार के खिलाफ इस्तेमाल की थी.
इसलिए तुलना से बचना मुश्किल है. दोनों जेएनयू छात्र राजनीति की उपज हैं, दोनों एक मुखर वैचारिक आवाज लाते हैं और दोनों कांग्रेस को युवा दर्शकों तक पहुंचने का तरीका देते हैं. लेकिन पार्टी यह भी जानती है कि जो राजनीति उन्हें लोकप्रिय बनाती है, वही बाद में बोझ बन सकती है.
अभी के लिए गांधी परिवार बोरा को सुर्खियों में लाने के इच्छुक दिख रहे हैं. क्या वे कांग्रेस और युवा मतदाताओं के बीच स्थायी पुल बनेंगी या एक और असफल प्रयोग साबित होंगी, यह देखना बाकी है. नया चेहरा गांधी परिवार की नजर में आ चुका है. असली परीक्षा अब शुरू होती है.