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युवाओं से विश्वासघात: 44 परीक्षाओं पर लीपापोती में जुटी हेमंत सरकार, सीबीआई जांच पर अड़े छात्र

संवाददाता

रांची। झारखंड में जेपीएससी (JPSC) और जेएसएससी (JSSC) भर्ती परीक्षाओं में हुए महाघोटाले और पेपर लीक ने हेमंत सोरेन सरकार के भ्रष्टाचार और प्रशासनिक विफलता की पोल खोलकर रख दी है। रांची के ऐतिहासिक जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम में युवाओं का आक्रोश 26वें दिन भी जारी है। अपनी नाकामी छुपाने के लिए आनन-फानन में 44 परीक्षाओं पर निर्णय लेने वाली झामुमो-कांग्रेस सरकार युवाओं का विश्वास पूरी तरह खो चुकी है। इनमें 22 परीक्षाएं रद्द की गईं, 17 की सीआईडी जांच के आदेश दिए गए वहीं 6 परीक्षाओं को स्थगित किया गया है। जेएसएससी-सीजीएल (JSSC-CGL) और टीडीपीएल (TDPL) की परीक्षाएं रद्द करने के बावजूद छात्र पीछे हटने को तैयार नहीं हैं। युवाओं का साफ कहना है कि राज्य सरकार की लीपापोती नहीं चलेगी, उन्हें मामले की निष्पक्ष केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) जांच और परीक्षा प्रणाली में पारदर्शी सुधार चाहिए।

बदले की राजनीति: भाजपा काल की 16 परीक्षाओं की CID जांच, अपने कार्यकाल पर पर्दा

हेमंत सरकार ने 17 प्रतियोगिता परीक्षाओं की सीआईडी (CID) जांच का आदेश जारी किया है। इसमें बदले की दुर्भावना साफ झलकती है, क्योंकि इनमें से 16 परीक्षाएं पूर्ववर्ती भाजपा सरकार के कार्यकाल की हैं और एक परीक्षा 2010 की है। राज्य सरकार अपनी ही जांच एजेंसी (CID) का इस्तेमाल कर राजनीतिक द्वेष साधने और जांच को मनमुताबिक मोड़ने का कुत्सित प्रयास कर रही है। हेमंत सरकार यह भूल रही है कि जनता उनके इस राजनीतिक ड्रामे को अच्छी तरह समझ चुकी है।

6 संदिग्ध परीक्षाओं को संरक्षण क्यों? हेमंत सरकार की मंशा पर गंभीर सवाल

एक तरफ भाजपा काल की परीक्षाओं को दुर्भावना से निशाना बनाया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ हेमंत सोरेन सरकार अपने ही कार्यकाल में हुई 6 संदिग्ध परीक्षाओं को बचाने में जुटी है। इन 6 परीक्षाओं को न तो रद्द किया गया और न ही इनकी पारदर्शी जांच के आदेश दिए गए। यह स्थिति सीधे तौर पर राज्य सरकार की मंशा पर सवाल खड़े करती है:

  • क्या इन 6 परीक्षाओं की तह तक जाने पर भ्रष्टाचार के तार सीधे सरकार के शीर्ष स्तर तक पहुंचते हैं?
  • चहेतों को बचाने के लिए ही क्या इन परीक्षाओं पर लीपापोती की जा रही है?

रद्द करने के बजाय 6 परीक्षाओं को महज ‘स्थगित’ कर समय काटने का खेल

सरकार ने छह प्रमुख भर्ती परीक्षाओं को रद्द करने के बजाय केवल ‘अगले आदेश तक स्थगित’ रखने का पैंतरा चला है। आउटसोर्सिंग एजेंसी की विश्वसनीयता पर उठे सवालों के बाद भी कड़े फैसले लेने के बजाय परीक्षाओं को महज स्थगित कर टालमटोल की नीति अपनाई जा रही है। इनमें ये परीक्षाएं शामिल हैः

1. फूड एनालिस्ट (विज्ञापन संख्या 05/2024)
2. डिप्टी डायरेक्टर-प्रॉसिक्यूशन (विज्ञापन संख्या 03/2025)
3. प्रोजेक्ट मैनेजर (विज्ञापन संख्या 04/2025)
4. इंस्पेक्टर ऑफ फैक्ट्रीज (विज्ञापन संख्या 01/2025)
5. बॉयलर इंस्पेक्टर (विज्ञापन संख्या 02/2025)
6. डायरेक्टर (विज्ञापन संख्या 07/2025) 

आंदोलन की धार तेज: CBI जांच की मांग पर भूख हड़ताल जारी

भर्ती तंत्र में फैले भ्रष्टाचार की जड़ों को काटने के लिए रूपेश कुमार और सबीता कुमारी जैसे आंदोलनकारी कड़ाके के संघर्ष के बीच अब भी भूख हड़ताल पर डटे हैं। छात्रों का स्पष्ट संदेश है कि सरकार के आधे-अधूरे फैसलों से वे भ्रमित होने वाले नहीं हैं। जब तक झारखंड के युवाओं के साथ न्याय नहीं होता और परीक्षाओं में हुई धांधली की सीबीआई जांच का औपचारिक आदेश जारी नहीं होता, तब तक यह अनशन और आंदोलन जारी रहेगा।

समिति गठन महज दिखावा, बड़े चेहरों को बेनकाब करने के लिए CBI जरूरी

दबाव में आई सरकार ने व्यवस्था सुधार के नाम पर वरिष्ठ आईएएस अधिकारी अमिताभ कौशल की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया है और आंतरिक सतर्कता प्रकोष्ठ (विजिलेंस सेल) की बात कही है। छात्र नेता मयंक राजपूत और कुणाल कुमार का कहना है कि यह केवल समय काटने का प्रशासनिक तरीका है। छात्रों की जीत तभी पूरी होगी जब पूरे सिंडिकेट की स्वतंत्र जांच सीबीआई करेगी, क्योंकि राज्य की एजेंसियां सत्ता के करीब बैठे बड़े मगरमच्छों पर कभी हाथ नहीं डाल पाएंगी।

भर्ती सिंडिकेट का पर्दाफाश: 2 से 70 लाख रुपये का ‘रेट चार्ट’

सीआईडी जांच में गोड्डा के पोड़ैयाहाट में तैनात प्रखंड आपूर्ति पदाधिकारी अभय तिवारी, उसकी पत्नी सुषमा कुमारी और भाई अक्षय तिवारी की गिरफ्तारी से संगठित भर्ती माफिया का खुलासा हुआ है। आरोपी ने पिछले 13 वर्षों में करीब 12 प्रतियोगी परीक्षाएं पास की थीं। जांच में सामने आया है कि विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए 2 लाख रुपये से लेकर 70 लाख रुपये तक का बाकायदा ‘रेट चार्ट’ तय था। जेएसएससी (JSSC) के शीर्ष अधिकारियों से पूछताछ यह दर्शाती है कि यह सिंडिकेट सत्ता और आयोग के संरक्षण के बिना संभव नहीं था।

22 प्रमुख परीक्षाएं रद्द:

सरकारी कुप्रबंधन की भेंट चढ़ा युवाओं का परिश्रम
सरकार की विफलता के चलते 22 अहम परीक्षाएं रद्द करनी पड़ी हैं, जिससे लाखों छात्रों का भविष्य अधर में लटक गया है। इनमें प्रमुख रूप से शामिल हैं:

  • कंबाइंड सिविल सर्विसेज एग्जामिनेशन 2023 (विज्ञापन 01/2024)
  • विश्वविद्यालयों में गैर-शैक्षणिक पदों की भर्ती (विज्ञापन 09/2025)
  • असिस्टेंट डायरेक्टर / सीनियर साइंटिफिक ऑफिसर (विज्ञापन 10/2025 व 11/2025)
  • ड्रग इंस्पेक्टर भर्ती (विज्ञापन 12/2025)
  • इंजीनियरिंग कॉलेजों में असिस्टेंट प्रोफेसर (विज्ञापन 02/2026)
  • पॉलिटेक्निक लेक्चरर नियमित व बैकलॉग (विज्ञापन 03/2026 व 04/2026)
  • मेडिकल कॉलेजों में असिस्टेंट प्रोफेसर सुपर स्पेशलिस्ट (विज्ञापन 07/2026)
  • फूड सेफ्टी ऑफिसर (विज्ञापन 18/2023) एवं सीडीपीओ (CDPO, विज्ञापन 21/2023)

JSSC-CGL रद्द होने से 1,975 अभ्यर्थियों के भविष्य पर संकट

झामुमो-कांग्रेस सरकार की सबसे बड़ी विफलता JSSC-CGL परीक्षा का रद्द होना है। इस परीक्षा के माध्यम से चयनित करीब 1,975 युवाओं का भविष्य सरकार के कुप्रबंधन के चलते अंधकार में चला गया है। वर्षों की मेहनत के बाद चयनित इन युवाओं के सामने पुनः असमंजस की स्थिति बन गई है कि क्या दोबारा परीक्षा होगी, उम्र सीमा में छूट मिलेगी या यह प्रक्रिया फिर से भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाएगी। हेमंत सरकार युवाओं को रोजगार देने के अपने हर वादे पर पूरी तरह विफल साबित हुई है।

5 लाख नौकरियों का चुनावी वादा निकला जुमला, बेरोजगारी भत्ता भी नदारद

हेमंत सोरेन ने युवाओं से सत्ता में आने पर हर साल 5 लाख सरकारी नौकरियां देने या बेरोजगारी भत्ता प्रदान करने का वादा किया था। पांच साल बीत जाने के बाद रोजगार देना तो दूर, पहले से चल रही भर्ती प्रक्रियाओं को भी भ्रष्टाचार और पेपर लीक की भेंट चढ़ा दिया गया। नियुक्तियों के नाम पर सिर्फ विज्ञापन निकाले गए और अंत में उन्हें रद्द या स्थगित कर युवाओं के सपनों पर पानी फेर दिया गया।

इंटरनेट बंदी के बाद भी पेपर लीक: सरकार के ‘फुलप्रूफ’ दावों की खुली पोल

परीक्षाओं में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के नाम पर सरकार ने पूरे राज्य में घंटों इंटरनेट सेवाएं बंद कर आम जनजीवन को अस्त-व्यस्त कर दिया। इस तानाशाही कदम के बावजूद पेपर लीक माफिया सक्रिय रहा और प्रश्नपत्र बाहर आ गए। इंटरनेट बंद करने जैसे कड़े दावों के बावजूद परीक्षा तंत्र की यह असफलता साबित करती है कि हेमंत सरकार का प्रशासनिक तंत्र पूरी तरह लचर और विफल हो चुका है।

दागी आउटसोर्सिंग एजेंसियों पर मेहरबानी: TDPL के चयन में बड़ा खेल

लाखों युवाओं के भविष्य से जुड़ी अत्यंत संवेदनशील भर्ती परीक्षाओं का जिम्मा टीडीपीएल (TDPL) जैसी विवादित और निजी आउटसोर्सिंग एजेंसी को सौंपने पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। बिना ठोस पृष्ठभूमि जांच के ऐसी कंपनियों को ठेका देना सीधे तौर पर कमीशनखोरी और मिलीभगत की ओर इशारा करता है। इस पूरे चयन प्रक्रिया में शामिल जिम्मेदार अधिकारियों और राजनीतिक आकाओं की भूमिका की गहराई से जांच होनी आवश्यक है।

हक मांग रहे छात्रों पर लाठीचार्ज और मुकदमे: सरकार का तानाशाही चेहरा

अपने लोकतांत्रिक अधिकारों और न्याय की मांग कर रहे निहत्थे छात्रों पर पुलिसिया बल प्रयोग, लाठीचार्ज और वॉटर कैनन चलवाना हेमंत सरकार की संवेदनहीनता को दर्शाता है। शांतिपूर्ण आंदोलन कर रहे निर्दोष छात्र नेताओं पर फर्जी मुकदमे और एफआईआर दर्ज कर सरकार युवाओं की आवाज को कुचलने का प्रयास कर रही है। यह सरकार की युवा-विरोधी और तानाशाही मानसिकता का प्रत्यक्ष प्रमाण है।

एंटी-चीटिंग कानून का दुरुपयोग: नकल माफिया बेखौफ, आवाज उठाने वालों पर शिकंजा

राज्य सरकार ने बड़े जोर-शोर से प्रतियोगी परीक्षा नकल विरोधी कानून लागू किया था, लेकिन इसका इस्तेमाल संगठित पेपर लीक सिंडिकेट को पकड़ने के बजाय धांधली उजागर करने वाले जागरूक छात्रों और विसलब्लोअर्स को डराने-धमकाने में किया जा रहा है। कड़े कानून की आड़ में सरकार अपनी प्रशासनिक विफलताओं और भ्रष्टाचार पर पर्दा डालने की कोशिश कर रही है।

लाखों युवाओं के ‘ओवरएज’ होने का संकट: आर्थिक और मानसिक प्रताड़ना

गांवों और दूरदराज के क्षेत्रों से आकर रांची जैसे शहरों में किराए के कमरों में रहकर वर्षों तक तैयारी करने वाले लाखों छात्र इस सरकारी कुप्रबंधन से टूट चुके हैं। बार-बार परीक्षाएं रद्द और स्थगित होने से हजारों मेधावी अभ्यर्थी उम्र सीमा (Age Limit) पार कर चुके हैं। न तो उन्हें दोबारा अवसर मिलने की गारंटी है और न ही उनके बहुमूल्य वर्षों की भरपाई संभव है, जिससे युवाओं में भारी हताशा और आक्रोश है।

भ्रष्टाचार के खिलाफ भाजपा का आक्रामक रुख: युवाओं की लड़ाई को सदन से सड़क तक समर्थन

भारतीय जनता पार्टी ने युवाओं के साथ हो रहे इस अन्याय के खिलाफ पूरी ताकत से मोर्चा खोल दिया है। भाजपा नेताओं ने विधानसभा के भीतर और बाहर हेमंत सरकार की वादाखिलाफी और भ्रष्टाचार को जोरदार तरीके से उठाया है। राज्यपाल को ज्ञापन सौंपकर पूरे मामले की सीबीआई जांच की मांग की गई है। भाजपा ने स्पष्ट किया है कि जब तक राज्य के युवाओं को न्याय नहीं मिल जाता और परीक्षा माफिया का राजनीतिक सिंडिकेट जेल की सलाखों के पीछे नहीं पहुंचता, यह संघर्ष जारी रहेगा।

राहुल-प्रियंका दिल्ली में छात्रों के साथ, झारखंड में क्यों नहीं

दिल्ली के जंतर-मंतर पर छात्र आंदोलन के समर्थन में पहुंचे राहुल गांधी, प्रियंका गांधी वाड्रा, अखिलेश यादव और मणिशंकर अय्यर से झारखंड के JPSC-JSSC अभ्यर्थियों का सवाल अब स्वाभाविक है। दिल्ली में छात्रों के बीच पहुंचकर उनके मुद्दों के समर्थन का संदेश देने वाले इन नेताओं में से कोई भी झारखंड के आंदोलन के बीच रांची पहुंचकर अभ्यर्थियों के साथ खड़ा नजर नहीं आया। यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि झारखंड में आंदोलनरत छात्र भी परीक्षा व्यवस्था, भर्ती प्रक्रिया और अपने रोजगार के भविष्य से जुड़े गंभीर सवाल उठा रहे थे। ऐसे में दिल्ली में छात्रों के समर्थन के लिए पहुंचने वाली राजनीतिक सक्रियता झारखंड में दिखाई न देना राजनीतिक प्राथमिकताओं पर सवाल खड़े करता है।

दीपके, सौरव दास और रांका का समर्थन सिर्फ दिल्ली तक सीमित क्यों रहा?

जंतर-मंतर आंदोलन से जुड़े अभिजीत दीपके, सौरव दास और आशुतोष रांका जैसे प्रमुख चेहरे भी झारखंड के JPSC-JSSC आंदोलन के दौरान रांची पहुंचकर छात्रों के बीच नहीं दिखाई दिए। खास तौर पर तब, जब इन चेहरों ने दिल्ली में छात्र हितों को लेकर मुखर भूमिका निभाई थी। राहुल गांधी ने झारखंड के छात्रों के समर्थन में मुख्यमंत्री को पत्र जरूर लिखा, लेकिन प्रत्यक्ष रूप से आंदोलन स्थल पर नहीं पहुंचे। ऐसे में झारखंड के अभ्यर्थियों के बीच यह सवाल उठना लाजिमी है कि छात्र हित का समर्थन क्या सिर्फ दिल्ली के जंतर-मंतर तक सीमित रहना चाहिए? यदि परीक्षा और रोजगार का सवाल दिल्ली के छात्रों के लिए महत्वपूर्ण है, तो वही सवाल झारखंड के युवाओं के लिए भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

झामुमो-कांग्रेस गठबंधन के दोहरे चरित्र का पर्दाफाश, युवाओं के जनाक्रोश से बदलेगा समीकरण

झारखंड की झामुमो-कांग्रेस सरकार ने पांच वर्षों में युवाओं को रोजगार के नाम पर केवल धोखे, पेपर लीक और प्रशासनिक लाठीचार्ज की सौगात दी है। दिल्ली में छात्रों के मसीहा बनने का दिखावा करने वाले विपक्षी नेताओं की रांची से दूरी ने उनके पाखंड को उजागर कर दिया है। 44 परीक्षाओं पर लीपापोती करने और चहेतों को बचाने की सरकारी कोशिशों के खिलाफ राज्य का युवा वर्ग अब जाग चुका है। जेपीएससी और जेएसएससी में पारदर्शी सुधार तथा निष्पक्ष सीबीआई जांच की मांग पर अड़े छात्रों का यह आंदोलन अब महज एक धरना नहीं, बल्कि भ्रष्ट व्यवस्था के खात्मे का जनांदोलन बन चुका है। भारतीय जनता पार्टी के निरंतर संघर्ष और युवाओं के अटूट संकल्प के आगे हेमंत सरकार को झुकना ही होगा, क्योंकि अपने अधिकारों के लिए सड़क पर उतरा झारखंड का भविष्य अब किसी झांसे में आने वाला नहीं है।

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