संवाददाता
नई दिल्ली । पश्चिम बंगाल की राजनीति में चल रही उठापटक अब और दिलचस्प मोड़ पर पहुंच गई है। तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के 20 बागी लोकसभा सांसदों ने जब नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) में विलय का दावा किया, तब यह माना जा रहा था कि पूरी प्रक्रिया पहले से तय रणनीति का हिस्सा होगी। लेकिन अब एनसीपीआई के एक शीर्ष नेता के बयान ने इस पूरे घटनाक्रम पर नए सवाल खड़े कर दिए हैं। सबसे हैरानी की बात यह है कि जिस पार्टी में 20 सांसदों के शामिल होने का दावा किया गया, उसी पार्टी के संस्थापक और राष्ट्रीय संगठन महासचिव शांतनु डे का कहना है कि उन्हें इसकी जानकारी सोशल मीडिया और न्यूज रिपोर्ट्स से मिली। उनका दावा है कि इस फैसले को लेकर उनसे कोई बातचीत तक नहीं हुई थी।
ऐसे में अब सवाल उठ रहा है कि आखिर यह विलय किस स्तर पर तय हुआ और क्या पार्टी के सभी शीर्ष नेताओं को इसकी जानकारी थी? अगर एनसीपीआई के संगठन महासचिव को जानकारी नहीं थी तो निर्णय किस स्तर पर लिया गया ? क्या टीएमसी के बागी सभी शीर्ष नेताओं की सहमति से विलय का निर्णय हुआ?

तृणमूल कांग्रेस के 20 सांसदों की अगुवाई कर रही काकोली घोष दस्तीदार ने लोकसभा अध्यक्ष को लिखित रूप से सूचित किया है कि उन्होंने एनसीपीआई में विलय का फैसला लिया है। अब इस दावे की वैधता और सांसदों के हस्ताक्षरों की पुष्टि के बाद ही लोकसभा अध्यक्ष फाइनल निर्णय लेंगे।
एनसीपीआई के संस्थापक और राष्ट्रीय संगठन सचिव शांतनु डे का साफ-साफ कहना है कि उन्हें अपनी ही पार्टी में 20 सांसदों के आने की खबर अखबारों, टीवी और सोशल मीडिया के जरिए मिली है। शांतनु डे का कहना था कि उन्हें पता चला है कि यह फैसला उनकी पार्टी के अध्यक्ष (पवन कुमार दास) ने अकेले ही स्तर पर लिया है, लेकिन अध्यक्ष जी ने अभी तक उनसे इस बारे में फोन पर कोई बात नहीं की है। हालांकि, हैरान होने के बावजूद शांतनु डे ने इस फैसले का स्वागत किया है। उन्होंने कहा, “अगर मेरी पार्टी बड़ी हो रही है, तो भला मैं खुश क्यों नहीं होऊंगा? हम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नीतियों का समर्थन करते हैं और देश के विकास के लिए एनडीए के साथ मिलकर काम करना चाहते हैं।” उन्होंने बागी टीएमसी नेता काकोली घोष दस्तीदार को न्योता भी दिया कि वे दिल्ली आएं, बैठकर बातचीत करें और जल्द ही एक साझा प्रेस कॉन्फ्रेंस करके आगे की रणनीति का एलान करें।
कहा जा रहा है कि काकोली घोष ने एनसीपीआई को विलय के लिए इसलिए चुना वह अपेक्षाकृत अपेक्षाकृत नई राजनीतिक पार्टी है और इसका बंगाल से भी नाता है । इसका गठन 2022 में हुआ था और इसने 2023 में चुनावी मैदान में अपनी मौजूदगी दर्ज कराई थी। हालांकि पार्टी अभी तक देश की किसी विधानसभा या संसद में प्रतिनिधित्व हासिल नहीं कर सकी है। यही वजह है कि 20 सांसदों के एक साथ इस पार्टी में शामिल होने के दावे ने राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है। इस पार्टी के जरिए टीएमसी के बागी सांसदों को लोकसभा में पूर्वोत्तर राज्यों का एक मजबूत चेहरा बनने का मौका मिलेगा। एनसीपीआई 2022 से चुनाव आयोग में रजिस्टर्ड है, इसलिए इसके जरिए दलबदल कानून से बचना आसान लग रहा था।
बदल जाएगा संसद में सीटों का गणित
अगर लोकसभा स्पीकर ओम बिरला इस विलय को कानूनी रूप से मंजूरी दे देते हैं, तो देश की संसद का गणित पूरी तरह बदल जाएगा। लोकसभा में एनडीए की ताकत 294 सीटों से बढ़कर सीधे 314 हो जाएगी। हालांकि, इसके बावजूद बीजेपी-नीत गठबंधन निचले सदन में दो-तिहाई बहुमत के आंकड़े से 46 सीटें दूर रहेगा। राज्यसभा में भी एनडीए का आंकड़ा 155 तक पहुंच सकता है, जो दो-तिहाई के जादुई आंकड़े के बेहद करीब है। ममता बनर्जी की पार्टी संसद में एक झटके में बेहद कमजोर हो जाएगी और उनके सांसदों की संख्या सिर्फ 8 रह जाएगी।



