
संवाददाता
गाजियाबाद। देश की राजधानी दिल्ली से सटे गाजियाबादा में लगातार बढ़ते भू-जल दोहन और भू-जल स्तर को सुधारने की चुनौती के बीच जिला प्रशासन ने नई रणनीति तैयार की है. जिले में प्रशासन द्वारा ”अमृत कूप परियोजना” की शुरुआत की गई है. इसके तहत सालों से बंद पड़े, या समय के साथ लुप्त हो चुके पुराने कुओं को दोबारा उपयोग में लाकर भू-जल रिचार्ज का माध्यम बनाया जाएगा. योजना के पहले चरण में 10 पुराने कुओं का जीर्णोद्धार किया जाएगा. इन कुओं के आसपास बने करीब दो दर्जन घरों की छतों पर रेन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम स्थापित कर उन्हें पाइपलाइन के माध्यम से कुओं से जोड़ा जाएगा. जिससे बारिश का पानी सीधे कुओं तक पहुंच सकेगा.
पुराने कुओं से होगा ग्राउंडवाटर रिचार्ज
बदलते दौर के साथ कुओं की उपयोगिता कम हुई तो धीरे-धीरे कुएं लुप्त होते चले गए. जिले के पुराने कुएं या तो बंद हो चुके हैं या समय के साथ अपना अस्तित्व खो चुके हैं. इन कुओं का इस्तेमाल कभी स्थानीय स्तर पर पानी की जरूरत को पूरा करने के लिए किया जाता था. लेकिन अब प्रशासन इन्हीं पुरानी जल स्रोतों को भू-जल संरक्षण की नई व्यवस्था से जोड़ने की तैयारी कर रहा है. प्रशासन अब ऐसे कुओं को ढूंढ कर उनका जीर्णोद्धार कर रहा है ताकि उन्हें दोबारा से एक्टिव किया जा सके, इसके बाद उन्हें बारिश के पानी को जमीन के भीतर पहुंचने के माध्यम के रूप में विकसित किया जाएगा.
छतों से कुओं तक पहुंचेगा बारिश का पानी
परियोजना के तहत प्रत्येक चिन्हित कुएं के आसपास स्थित करीब दो दर्जन घरों को रूफटॉप रेनवाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम से जोड़ने की योजना है. इसके लिए घरों की छतों से पर गिरने वाले बारिश को पानी को एकत्रित कर पाइपलाइन के माध्यम से नजदीकी कुएं तक पहुंचाया जाएगा. यह व्यवस्था बड़े स्तर पर ग्राउंडवाटर को रिचार्ज करने में कारगर साबित होगी.

अमृत कूप परियोजना के तहत होगा कम
मुख्य विकास अधिकारी कुमार सौरभ के मुताबिक, ”अमृत कूप परियोजना के तहत पहले चरण में 10 पुराने कुओं का जीर्णोद्धार करने का निर्णय लिया गया है. इसके लिए डाबर इंडिया लिमिटेड के साथ कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी के अंतर्गत एमओयू साइन किया गया है. परियोजना का क्रियान्वयन पूर्वा फाउंडेशन द्वारा किया जाएगा, जबकि उत्तर प्रदेश भूगर्भ जल विभाग गाजियाबाद की ओर से आवश्यक तकनीकी मार्गदर्शन दिया जाएगा.”
प्रशासन बनेगा कड़ी
जिला प्रशासन संबंधित विभागों, ग्राम पंचायत और अन्य पक्षों के बीच समन्वय स्थापित करेगा, ताकि परियोजना को निर्धारित योजना के अनुसार आगे बढ़ाया जा सके. इसके तहत चयनित कुओं की स्थिति का आकलन करने, और आसपास के क्षेत्र को रूफटॉप रेनवाटर हार्वेस्टिंग से जोड़ने का काम किया जाएगा. परियोजना के तहत शुरुआती चरण में 10 कुओं को मॉडल के रूप में विकसित करने की तैयारी है. इन स्थलों पर किए जाने वाले कार्यों और उनके परिणामों के आधार पर आगे दूसरे कुओं की निर्धारित योजना तैयार की जाएगी. यदि शुरुआती चरण में व्यवस्था प्रभावित रहती है तो परियोजना का दायरा बढ़ाकर जिले के अन्य हिस्सों में भी इसी तरह के प्रयास किए जाएंगे.
जिला प्रशासन से मिली जानकारी के मुताबिक, प्रत्येक कुएं के जीर्णोद्धार पर करीब डेढ़ से ₹200000 खर्च किए जाएंगे. इस राशि से कुएं की स्थिति के अनुरूप जरूरी कार्य कराए जाएंगे. इसके साथ ही कुएं के आसपास के क्षेत्र का सौंदर्यीकरण भी कराया जाएगा, ताकि पुरानी जल स्रोत स्थानीय लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र बना रहे. प्रशासन का मानना है कि जहां एक तरफ यह कुएं ग्राउंडवाटर रिचार्ज का माध्यम बनेंगे तो वहीं दूसरी तरफ लोगों में जल संरक्षण के प्रति जागरूकता पैदा करने में भी कारगर साबित होंगे.
रिमोट सेंसिंग सर्वे से खोजे जा रहे लोग कुएं
गाजियाबाद में पुराने और लुप्त हो चुकी कुओं की पहचान के लिए रिमोट सेंसिंग सेंटर लखनऊ के माध्यम से सर्वे कराया जा रहा है. इस सर्वे का उद्देश्य उन स्थानों का पता लगाना है जहां पहले कुआँ मौजूद थे लेकिन वर्तमान में उनका अस्तित्व स्पष्ट रूप से दिखाई नहीं देता. सर्वे के माध्यम से संभावित कुओं की पहचान की जा रही है. इसके साथ ही स्थानीय लोगों से भी जानकारी जुटा जा रही है, ताकि पुराने कुओं की स्थिति और उनके स्थान के बारे में उपलब्ध जानकारी का मिलान किया जा सके.
प्रशासन की लोगों से अपील
जिला प्रशासन द्वारा लोगों से अपील की गई है कि यदि उनके आसपास कोई बंद कुआं निष्क्रिय बोरवेल या बंद पड़ी वर्षा जल संचयन प्रणाली मौजूद है तो उसकी जानकारी भूगर्भ जल विभाग गाजियाबाद को दें. ताकि संबंधित विभागों के समन्वय से ग्राउंड इंस्पेक्शन कराया जा सके.
पहले चरण में इन गांवों में होगा कण का जुनून धार
प्रशासन की ओर से जिन स्थानों पर पुराने कुओं की पहचान और जुड़े उधर से संबंधित काम किया जा रहा है उनमें सुराना, रावली, डिडौली, दबाना, चुड़ियाला, फरीदनगर, फफराना और शाहजहांपुर गांव शामिल हैं.
यदि योजना को प्रभावी ढंग से लागू किया जाता है और स्थानीय लोगों की भागीदारी भी बनी रहती है तो पुराने कुएं केवल अतीत की निशानी बनकर नहीं रहेंगे बल्कि भविष्य के लिए जल संरक्षण की उपयोगी माध्यम बन सकते हैं. प्रशासन की कोशिश है कि इन जल स्रोतों को नया जीवन देकर बारिश के पानी को सहज ने की ऐसी व्यवस्था विकसित की जाए जिससे आगे चलकर जिले में लगातार गिर रहे भू-जल स्तर को मेंटेन किया जा सके.



