
संवाददाता
नई दिल्ली। भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश पुलिस को एक बड़ी राहत देते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें जांच प्रक्रिया को लेकर पुलिस पर व्यापक दिशा-निर्देश और एक लंबी-चौड़ी चेकलिस्ट थोप दी गई थी।
सुप्रीम कोर्ट ने दो टूक शब्दों में स्पष्ट किया है कि आपराधिक न्याय प्रशासन को चलाना या राज्य को निर्देश देना संवैधानिक अदालतों का काम नहीं है, खासकर तब जब देश में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता BNSS” 2023 जैसे नए कानून पहले से लागू हैं।
यह पूरा मामला ‘उत्तर प्रदेश राज्य बनाम सुभाष चंद्र व अन्य’ से जुड़ा है।
विवाद की शुरुआत एक मामले में पुलिस द्वारा लगाई गई ‘क्लोजर रिपोर्ट’ से हुई थी। ACJM ने पुलिस रिपोर्ट को दरकिनार कर एक प्रोटेस्ट पिटीशन पर आरोपियों को समन जारी कर दिया, जिसे हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी। सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने आपराधिक जांच प्रक्रिया को सुधारने का जिम्मा खुद उठाते हुए डीजीपी ट्रेनिंग एडीजी क्राइम और डीजीपी अभियोजन को तलब कर लिया। नतीजा यह हुआ कि अभियोजन निदेशालय ने 41 अध्यायों और 390 पन्नों की एक विस्तृत चेकलिस्ट तैयार कर डाली और हाईकोर्ट ने 12 मई 2025 के अपने आदेश पैरा 33 में पुलिस के लिए कई कड़े निर्देश जारी कर दिए। राज्य सरकार ने इसी आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस जे. बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने हाईकोर्ट के इस रवैये पर कड़ी असहमति जताई। 31 अगस्त 2026 को सुनाए गए अपने फैसले में शीर्ष अदालत ने कहा कि नए कानून BNSS में जांच के आधुनिक तरीके, डिजिटल साक्ष्य संकलन और फोरेंसिक उपाय पहले से ही मौजूद हैं। अदालत ने सख्त लहजे में कहा कि जब प्रक्रिया पहले से तय है, तो अदालतों को प्रशासक की भूमिका में नहीं आना चाहिए। व्यवस्था में कमियां दिखने पर अदालतें दखल दे सकती हैं, लेकिन इस तरह के थोक निर्देश जारी करना कतई उचित नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर भी हैरानी जताई कि जब हाईकोर्ट ने खुद ही मजिस्ट्रेट के समन को रद्द कर पुलिस की क्लोजर रिपोर्ट को सही मान लिया था, तो फिर पुलिस अधिकारियों को बुलाकर जांच की नई प्रक्रिया तय करने की क्या जरूरत थी। इन ठोस तर्कों के साथ, सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार की याचिका को न्यायसंगत मानते हुए हाईकोर्ट के उन सभी निर्देशों को आदेश से हटा दिया है।



