
संवाददाता
नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त 2026 को लालकिले से अपने भाषण में ‘दिमागी नक्सली’ जैसे नए शब्द युग्म का उल्लेख किया. इसे लेकर विपक्ष की तिलमिलाहट देखने लायक रही है. यह जानते हुए कि नक्सली जिस किसी भी प्रकृति का हो, जन सामान्य को तो स्वीकार हो ही नहीं सकता. सत्ता और सिस्टम के विरोध के मकसद से खून-खराबा और विध्वंस की नक्सलियों की नीति किसी को कैसे पसंद आएगी. पर, आश्चर्य हुआ यह देख कर कि कांग्रेस और आम आदमी पार्टी समेत कुछ विपक्षी पार्टियों के नेता खुद को ‘दिमागी नक्सली’ डिक्लेयर करने लगे. मंत्री के रूप में देश की वित्त व्यवस्था संभाल चुके कांग्रेस के सीनियर लीडर पी. चिदंबरम ने सबसे पहले अपने को ‘दिमागी नक्सली घोषित किया.
कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने भी अपने को दिमागी नक्सली साबित करने के तर्क गढ़ लिए. उन्होंने कहा- ‘अगर अधिकारों की बात करना दिमागी नक्सली होना है, तो हम सब दिमागी नक्सली हैं.’ इंडिया ब्लाक की दूसरी पार्टियां भी इस होड़ में शामिल हो गईं. आम आदमी पार्टी के संयोजक और दिल्ली के पूर्व सीएम अरविंद केजरीवाल, राजद सांसद मनोज झा, पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ्ती, टीएमसी सांसद कीर्ति आजाद जैसे नेता अपने-अपने अंदाज में प्रधानमंत्री की बात को व्याख्यायित करते हुए खुद को दिमागी नक्सली बताने लगे.
सभी के अपने-अपने तर्क
अरविंद केजरीवाल ने कहा- ‘प्रधानमंत्री मोदी की परिभाषा के अनुसार, जो कोई भी देश में सड़ी-गली व्यवस्था को बदलने और सरकार से सवाल पूछने की हिम्मत करता है, उसे ‘दिमागी नक्सली’ कह दिया जाता है.’ चिंदबरम की हड़बड़ी ऐसी रही कि एक ही दिन उन्होंने सोशल मीडिया पर 2 पोस्ट डाले. पहले में उन्होंने डायरेक्ट लिखा- ‘I am proud to be a dimagi naxal!’ (मुझे दिमागी नक्सली होने पर गर्व है). दूसरे में लिखा- ‘दिमागी नक्सल’ शब्द भाजपा का पुराना राजनीतिक हथकंडा है.’ इसी तरह पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ्ती, राजद सांसद मनोज झा और टीएमसी नेता कीर्ति आजाद ने भी खुद को दिमागी नक्सली की श्रेणी में बताने के लिए तर्क गढ़ लिए.
नरेंद्र मोदी सरकार को नक्सलवाद के सफाए का श्रेय जाता है. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के संककल्प का परिणाम है कि रेड कारीडोर का सपना देख रहे नकस्लियों को हथियार डालने पड़े हैं. पहले देश के 126 जिले नक्सल प्रभावित माने जाते थे. 31 मार्च 2026 तक गृह मंत्री ने नक्सलवाद को खत्म करने का संकल्प लिया था. हालांकि कांग्रेस भी नक्सलियों के खिलाफ रही है. 1970 के दशक में पश्चिम बंगाल में नक्सलवाद के सफाए के लिए वहां की कांग्रेस सरकार ने जो सख्ती की, इस क्रम में नक्सली बता कर बड़े पैमाने पर लोगों को मारा गया. बंगाल की जनता को कांग्रेस सरकार का खून-खराबा नहीं जंचा और इसका परिणाम यह हुआ कि वामपंथियों लंबे समय तक शासन का मौका नहीं मिला. प्रधानमंत्री रहते खुद मनमोहन सिंह ने स्वीकार किया था कि देश की आर्थिक तरक्की में नकस्ली सबसे बड़़ी बाधा है. इसके बावजूद कांग्रेस नेताओं को नक्सली कहलाना पसंद आने लगा है तो इसकी एक ही वजह है- नरेंद्र मोदी की हर अच्छी-बुरी बात का विरोध.
तिलमिला जाती है कांग्रेस
ऐसा पहली बार नहीं हुआ है कि मोदी के बयान पर कांग्रेस समेत विपक्ष की पार्टियां की तिलमिलाहट दिखी हो. 2019 में राहुल गांधी ने राफेल विमान सौदे में भ्रष्टाचार और पक्षपात के आरोप लगाते हुए नरेंद्र मोदी के लिए ‘चौकीदार चोर है’ का नारा दिया. मोदी ने इसे पलट कर ‘मैं भी चौकीदार’ अभियान बना दिया. भाजपा समर्थक इस नारे के साथ खड़े हो गए. विपक्ष का आरोप आंदोलन में बदल गया. आरोप लगाने वाले विपक्ष पर यह दांव उस पर ही उल्टा पड़ गया. ताजातरीन 2 ऐसे मौके मोदी ने विपक्ष को और दे दिए. पहले ‘दिमागी नक्सली’ और अब ‘नाराज फूफा’ के तंज ने विपक्ष को झकझोर दिया है.
उनकी तिलमिलाहट उनके बयानों से साफ झलकती है. भाजपा पहले से ही नक्सलियों से सहानुभूति रखने वाले लोगों को अर्बन नक्सल कहती रही है. प्रधानमंत्री ने सिर्फ शब्द बदल कर दिमागी नक्सल कहा. मोदी के ‘नाराज फूफा’ की चर्चा हाल ही में श्री राम कॉलेज ऑफ कॉमर्स (एसआरसीसी) के कार्यक्रम में की. उन्होंने कहा कि समाज में दो तरह के लोग होते हैं-एक जो देश की ताकत बढ़ाते हैं, दूसरे जो हर नए काम पर ‘नाराज फूफा’ बन कर विरोध करते हैं. इस पर विपक्ष भड़क गया है. मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा कि मोदी हर साल नया विशेषण गढ़ते हैं- नाराज फूफा, दिमागी नक्सल, अर्बन नक्सल, खान मार्केट गैंग, आंदोलनजीवी आदि. वे इसके जरिए अपनी नाकामियां छिपाने का प्रयास करते हैं.
अब ‘नाराज फूफा’ पर बहस
नरेंद्र मोदी ने ‘नाराज फूफा’ कह कर सरकार की हर नीति और विकास परियोजनाओं का विरोध करने वालों पर तंज कसा था. उन्होंने आलोचकों की तुलना शादियों में अक्सर बिना बात के मुंह फुलाने वाले रिश्तेदारों से करते हुए कहा कि कुछ लोग ‘नाराज फूफा’ की तरह होते हैं, जो देश के हर नए प्रोजेक्ट या पहल का विरोध करने का बहाना ढूंढते हैं. इसे लेकर कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने कहा है कि जब भी जनता या विपक्ष सरकार की नाकामियों, हादसों और सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाता है, तो उन्हें ‘दिमागी नक्सल’ या ‘नाराज फूफा’ कह कर उनके सवालों को टाल दिया जाता है. आने वाले दिनों में इस पर दूसरे विपक्षी नेताओं की टिप्पणी भी राहुल गांधी जैसी आ सकती है.



