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भाजपा के गढ गाजियाबाद में खस्‍ता हाल कांग्रेस संगठन सपा के साथ मिलकर भी भगवा पार्टी से कमजोर

संवाददाता

गाजियाबाद । राहुल गांधी की तमाम कोशिशों के बावजूद गाजियाबाद में वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य को देखते हुए कांग्रेस संगठन की हालत जमीनी स्तर पर बेहद कमजोर बनी हुई है। 2027  के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के लिए अकेले भाजपा का सीधा मुकाबला करना उसके लिए बेहद चुनौतीपूर्ण है। हालांकि, पार्टी खुद को मजबूत करने की कोशिशों में जुटी हुई है।

गाजियाबाद को पारंपरिक रूप से भाजपा का एक मजबूत गढ़ माना जाता है। गाजियाबाद नगर निगम  के 100 वार्डों में से वर्तमान में भाजपा के पास 78 पार्षद हैं, जबकि कांग्रेस के पास केवल 3 पार्षद हैं। यह आंकड़ा बताता है कि कांग्रेस की जमीनी पकड़ शहरी इलाकों में बेहद सीमित है।

कांग्रेस के पास जिले में कुछ गिने-चुने चेहरे (जैसे डॉली शर्मा) ही प्रमुख हैं। हालांकि स्थानीय मुद्दों, जैसे नगर निगम में टैक्स विसंगतियों या कानून व्यवस्था को लेकर कार्यकर्ता गाहे-बगाहे प्रदर्शन करते दिखे हैं, लेकिन भाजपा के विशाल संगठन और लगातार सक्रिय रहने वाले कैडर के मुकाबले उनका ढांचा काफी छोटा है।

2027 के चुनावों में भाजपा को टक्कर देने की कांग्रेस की क्षमता पूरी तरह से गठबंधन और साझा रणनीति पर निर्भर करेगी। कांग्रेस उत्तर प्रदेश और गाजियाबाद में अकेले दम पर भाजपा को हराने की स्थिति में नहीं है। उम्‍मीद है कि कांग्रेस 2027 के रण के लिए समाजवादी पार्टी (सपा) के साथ मैदान में उतरेगी । लेकिन कांग्रेस का ‘इंडिया गठबंधन’ गाजियाबाद की जमीन पर कितना मजबूत रहता है, यह पिछले चुनाव में ही दिख गया था। हांलाकि दोनों पार्टियां मिलकर मजबूती से चुनाव लड़ती हैं, तभी वे भाजपा के वोट बैंक में सेंध लगा पाएंगीए लेकिन दिक्‍कत ये है कि समाजवादी पार्टी की हालत भी खास मजबूत नहीं है ।

चुनाव से पहले सपा और कांग्रेस के बीच सीटों के बंटवारे और वर्चस्व की अंदरूनी लड़ाई अभी से देखने को मिल रही है (जैसे हाल ही में दोनों दलों के बीच ‘बरगद बनाम आम’ की बयानबाजी हुई)। गाजियाबाद की पांचों विधानसभा सीटों पर भाजपा में जहां अभी से टिकट के लिए जबरदस्त घमासान शुरू हो चुका है, वहीं विपक्ष को गठबंधन के तहत एक सर्वसम्मत और मजबूत चेहरा उतारना होगा।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश और गाजियाबाद के शहरी क्षेत्रों में मध्यम वर्ग और व्यापारी वर्ग काफी हद तक भाजपा के साथ जुड़ा हुआ है। कांग्रेस और सपा का मुख्य दारोमदार युवा बेरोजगारी, महंगाई और अल्पसंख्यक व दलित (पीडीए) वोटों के ध्रुवीकरण पर रहेगा।

गाजियाबाद में कांग्रेस का संगठन फिलहाल बेहद कमजोर और सीमित है। 2027 में वह भाजपा को सीधी टक्कर तभी दे पाएगी जब समाजवादी पार्टी के साथ उसका गठबंधन पूरी तरह जमीन पर एकजुट होकर काम करे और वे शहरी वोटरों को आकर्षित करने के लिए कोई नया व प्रभावी एजेंडा पेश कर सकें। लेकिन भाजपा के गढ गाजियाबाद में दोनों दलों की ताकत मिलकर भी भगवा पार्टी को पीछे धकेल पाएगी इसमें संदेह है।

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