
संवाददाता
नई दिल्ली। दिल्ली के भारत मंडपम में चल रहे ब्रिक्स समिट में दुनिया भर के कई बड़े और दिग्गज नेता जुटे हैं. रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन भी इस खास बैठक में हिस्सा लेने दिल्ली आ चुके हैं. दिल्ली पहुंचते ही पीएम मोदी के साथ उनकी एक बेहद अहम मीटिंग हुई, जिसमें डिफेंस से लेकर ट्रेड जैसे बड़े मुद्दों पर खुलकर बात हुई. इन्हीं में सबसे खास मुद्दा रहा ‘इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर’ (INSTC), जिसका सपना लेकर पुतिन दिल्ली पहुंचे हैं. यs एक ऐसा मास्टरप्लान है जो रूस को सीधे भारत से कनेक्ट कर देगा. पुतिन पटरियों, सड़कों और समंदर के रास्ते भारत तक पहुंचने का एक मजबूत शॉर्टकट तैयार करना चाहते हैं, जिसके बारे में उन्होंने दिल्ली आने से ठीक पहले बात भी की थी.
क्या है पुतिन का वो सपना जो रूस को सीधा भारत से जोड़ेगा?
रूस चाहता है कि मुंबई से मॉस्को तक का सफर सिर्फ कागजों पर नहीं, बल्कि पटरियों, सड़कों और समंदर के एक मजबूत नेटवर्क के जरिए तेजी से तय हो. रूसी लीडरशिप की नजर अब इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (INSTC) को पूरी तरह हकीकत में बदलने पर टिकी है. अगर पीएम नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति पुतिन की मुलाकात में इस मेगा प्रोजेक्ट को रफ्तार मिल जाती है, तो आने वाले दिनों में भारत और रूस के बीच मालगाड़ियों की गड़गड़ाहट पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को नई दिशा देगी.
‘हिंद महासागर तक ट्रेन से पहुंचेगा सामान’
रूस के उप-प्रधानमंत्री मरात खुसनुलिन ने हाल ही में रूसी समाचार एजेंसी TASS को दिए एक खास इंटरव्यू में इस पूरे प्लान का खुलासा किया था. उन्होंने कहा कि रूस अब भारत और हिंद महासागर तक पहुंचने के लिए एक सीधे रेलवे लिंक की संभावना तलाश रहा है. खुसनुलिन के मुताबिक, तुर्कमेनिस्तान, ईरान, अफगानिस्तान या पाकिस्तान के रास्तों का इस्तेमाल करके भारत तक कनेक्टिविटी बनाई जा सकती है.
रूस का मानना है कि पारंपरिक समुद्री रास्तों पर बढ़ते सैन्य तनाव और पाबंदियों को देखते हुए ये कदम उठाना बेहद जरूरी हो गया है. रूस चाहता है कि उसका सामान बिना किसी रुकावट के भारतीय बाजारों तक पहुंचे और भारत में बना माल सीधे रूसी शहरों तक सप्लाई किया जा सके.
- 7,200 किमी का मल्टीमॉडल नेटवर्क: ये पूरा नेटवर्क लगभग 7,200 किलोमीटर लंबा है, जिसमें ट्रेन, सड़क और समंदरी जहाज तीनों का तालमेल होता है.
- कैसे काम करता है ये रास्ता: इस प्रोजेक्ट के तहत भारत के मुंबई पोर्ट से सामान जहाज में लादकर ईरान के बंदर अब्बास या चाबहार पोर्ट भेजा जाता है. वहां से रेल और सड़क के जरिए ये माल अजरबैजान या मध्य एशियाई देशों से होते हुए रूस के अस्त्रखान और फिर मॉस्को तक पहुंचता है.
- समय और पैसे की भारी बचत: साल 2014 में इस रूट पर कराए गए ड्राई रन से पता चला था कि पुराने सुएज नहर वाले रास्ते के मुकाबले इस कॉरिडोर से हर 15 टन सामान पर करीब 2,500 डॉलर यानी लगभग 2 लाख रुपए की सीधी बचत होती है. साथ ही, सामान पहुंचने का समय भी 40-45 दिनों से घटकर सिर्फ 18 से 25 दिन रह जाता है.
- सस्ता कच्चा तेल और खाद: भारत रूस से भारी मात्रा में क्रूड ऑयल और फर्टिलाइजर खरीदता है. सीधा और सस्ता रास्ता मिलने से ट्रांसपोर्ट का खर्च घटेगा, जिससे भारत में ईंधन और खेती की लागत कम हो सकती है.
- सेंट्रल एशिया तक सीधी पहुंच: पाकिस्तान खुन्नस में भारत को जमीनी रास्ता नहीं देता है, जिसकी वजह से भारत को कजाकिस्तान, उज्बेकिस्तान और तुर्कमेनिस्तान जैसे संसाधनों से भरे सेंट्रल एशियाई देशों से सीधे ट्रेड करने में मुश्किल होती है. INSTC के जरिए भारत के लिए इन सभी देशों के दरवाजे खुल जाएंगे.
- भारतीय सामान की फटाफट डिलीवरी: भारत की बनी दवाएं, कपड़े, चाय, ऑटो पार्ट्स और मशीनरी बहुत कम समय में और कम किराए में रूस और यूरोप के बाजारों तक पहुंच सकेंगी.
- अशगाबात समझौते से तालमेल: भारत 2018 में अशगाबात समझौते में शामिल हुआ था, जो मध्य एशिया और फारस की खाड़ी के बीच व्यापार को बढ़ावा देता है. INSTC का ये नया रेल और रोड नेटवर्क इस समझौते के साथ पूरी तरह फिट बैठता है.
- रेलवे लाइन के गायब टुकड़े: सबसे बड़ी समस्या ये है कि ईरान और सेंट्रल एशिया के कुछ हिस्सों में रेलवे लाइन के टुकड़े अभी तक पूरे नहीं हुए हैं. ईरान में रश्त से अस्टारा के बीच की रेल लाइन को पूरा करना बहुत जरूरी है.
- अलग-अलग गेज सिस्टम : अलग-अलग देशों की रेलवे पटरियों की चौड़ाई अलग-अलग है. इसका मतलब है कि सीमा पार करते समय सामान को एक ट्रेन से दूसरी ट्रेन में शिफ्ट करना पड़ता है या बोगियों के पहिए बदलने पड़ते हैं, जिससे समय लगता है.
- कागजी कार्रवाई और कस्टम: कई देशों से होकर गुजरने वाले इस रास्ते में सीमा शुल्क पॉलिसीज और टैक्स की दरें अलग-अलग हैं. इन्हें एक समान बनाना एक बड़ी प्रशासनिक चुनौती है.



