
संवाददाता
नई दिल्ली। देश की राजधानी की सड़कों और बाजारों में सिंगल यूज़ प्लास्टिक (एसयूपी) के खिलाफ जंग केवल फाइलों तक सिमटती नजर आ रही है। जुलाई 2022 में लगाए गए केंद्र सरकार के प्रतिबंध को चार साल बीत जाने के बाद भी दिल्ली की जमीनी हकीकत डराने वाली है। हकीकत यह है कि दुकानदार और लोग दोनों ही पर्यावरण से ज्यादा अपनी सुख- सुविधा को प्राथमिकता दे रहे हैं।
सड़कों पर ”नियम” नहीं, ”सुविधा” का राज
दिल्ली के पाश इलाकों के बड़े शोरूम और माल में तो नियम दिखाई देते हैं, लेकिन असली दिल्ली यानी साप्ताहिक बाजारों, जूस की दुकानों और रेहड़ी-पटरी वालों पर प्रतिबंध का कोई खौफ नहीं है।
हालांकि कागज के कप और लकड़ी के चम्मच बाजार में हैं, लेकिन उनकी लागत प्लास्टिक से कहीं अधिक है। कहने को 55 प्रतिशत लोग कपड़े का थैला लाने लगे हैं, लेकिन एक बड़ा वर्ग अब भी मानता है कि डिस्पोजेबल प्लास्टिक ”हाइजीनिक” होती है।
- सख्त निगरानी : जीरो-कंप्लायंस वाले क्षेत्रों (जैसे साप्ताहिक बाजार) में बिना किसी ढिलाई के नियमित छापेमारी हो।
- सप्लाई चेन पर वार : उन गुप्त मैन्युफैक्चरिंग यूनिटों को सील किया जाए जो चोरी-छिपे इनका उत्पादन कर रही हैं।
- विकल्पों को प्रोत्साहन : सरकार को बायोडिग्रेडेबल कटलरी और कपड़े के थैले बनाने वाले उद्योगों को सब्सिडी देनी चाहिए ताकि वे प्लास्टिक का मुकाबला कर सकें।
”टॉक्सिक्स लिंक” की नई रिपोर्ट ने भी खोली पोल
पर्यावरण थिंक टैंक ”टॉक्सिक्स लिंक” की ताजा रिपोर्ट “रीविजिटिंग सिंगल यूज़ प्लास्टिक बैन” ने भी दिल्ली के दावों की पोल खोल दी है। चार बड़े शहरों को मिलाकर कुल 84 न्रतिशत सर्वे साइटों (560 स्थानों) पर प्रतिबंधित प्लास्टिक खुलेआम बिकता या इस्तेमाल होता पाया गया।
सर्वे के मुताबिक दिल्ली देश का दूसरा सबसे प्रदूषित शहर बनकर उभरा है जहां 86 प्रतिशत साइटों पर प्रतिबंधित प्लास्टिक खुलेआम बिक रहा है। संगठन द्वारा अप्रैल से अगस्त 2025 के बीच किए गए सर्वे में दिल्ली की स्थिति बेहद चिंताजनक पाई गई है। आंकड़ों की तुलना करें तो दिल्ली कचरे के प्रबंधन में बुरी तरह पिछड़ रही है।
| शहर | प्रतिबंधित प्लास्टिक की मौजूदगी (प्रतिशत में) | रैंकिंग |
|---|---|---|
| भुवनेश्वर | 89 प्रतिशत | प्रथम (सबसे खराब) |
| दिल्ली | 86 प्रतिशत | द्वितीय |
| मुंबई | 85 प्रतिशत | तृतीय |
| गुवाहाटी | 76 प्रतिशत | चतुर्थ |
टॉक्सिक्स लिंक के एसोसिएट डायरेक्टर सतीश सिन्हा के अनुसार, भारत को अब ”बैन” से आगे बढ़कर ”सिस्टम” बदलने की जरूरत है।
वहीं टाक्सिक्स लिंक के निदेशक रवि अग्रवाल कहते हैं, जब तक सप्लाई चेन की जड़ों पर प्रहार नहीं होगा और प्रवर्तन में निरंतरता नहीं आएगी, तब तक दिल्ली के लैंडफिल साइटों पर भी प्लास्टिक के पहाड़ ऐसे ही बढ़ते रहेंगे।



