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कॉकरोच पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके ने कहा- शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफ़ा नहीं दिया तो पूरे देश में होगा प्रोटेस्ट

5 घंटे तक चले प्रदर्शन के दौरान CJP के संस्थापक अभिजीत दीपके ने कहा कि "जहां सिस्टम सड़ता है, वहीं कॉकरोच बाहर निकलते हैं"

संवाददाता

नई दिल्ली । केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर शनिवार को दिल्ली के जंतर-मंतर पर पांच घंटे तक विरोध प्रदर्शन हुआ. इस प्रदर्शन में देश के विभिन्न हिस्सों से आए छात्र-युवाओं ने हिस्सा लिया. कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के बैनर तले आयोजित इस प्रदर्शन में राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA) और शिक्षा मंत्रालय की विफलताओं को लेकर सरकार को घेरा गया.

मंच से चेतावनी देते हुए कॉकरोच जनता पार्टी के अभिजीत दीपके ने कहा कि यदि धर्मेंद्र प्रधान ने शाम 5 बजे तक इस्तीफ़ा नहीं दिया तो सीजेपी पूरे भारत के अलग-अलग शहरों में अपना विरोध प्रदर्शन जारी रखेगी. प्रदर्शन के दौरान अभिजीत दीपके ने ये भी कहा कि “जहां सिस्टम सड़ता है, वहीं कॉकरोच बाहर निकलते हैं” और आज जंतर-मंतर पर जुटी भीड़ व्यवस्था के खिलाफ लोगों के बढ़ते आक्रोश का प्रतीक है.

अभिजीत दीपके x पर लिखा,” मैं अपने माता-पिता से मिलने घर जा रहा हूँ. उनसे आखिरी बार मिले हुए एक साल से ज़्यादा हो गया है. पिछले 15 दिनों में उन्हें बहुत परेशानी झेलनी पड़ी है और धमकियों की वजह से उन्हें घर छोड़ना पड़ा था. मैं उन्हें वापस घर ले जाऊंगा. आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि आज का विरोध प्रदर्शन तो बस एक ट्रेलर था. इतनी बड़ी संख्या में आने के लिए आपका धन्यवाद.”

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शांतिपूर्ण आंदोलन सबसे बड़ी ताकत

प्रदर्शन को संबोधित करते हुए अभिजीत दीपके ने समर्थकों से आंदोलन को शांतिपूर्ण बनाए रखने की अपील की. उन्होंने कहा कि पिछले पांच दिनों से लगातार लोगों से अनुरोध कर रहे हैं कि किसी भी परिस्थिति में प्रदर्शन का स्वरूप खराब नहीं होना चाहिए. उन्होंने कहा, “बहुत सारी ताकतें चाहती हैं कि यह प्रोटेस्ट असफल हो जाए, लेकिन यह हम सबकी जिम्मेदारी है कि ऐसा न होने दें. कुछ भी हो जाए, हम इस आंदोलन को फेल नहीं होने देंगे.”

सोशल मीडिया से सड़क तक पहुंच गया आंदोलन

दीपके ने उन आलोचनाओं का भी जवाब दिया जिनमें कहा जाता था कि केवल सोशल मीडिया पर सक्रिय रहने से जमीनी बदलाव नहीं आता. उन्होंने प्रदर्शन में जुटी भीड़ की ओर इशारा करते हुए कहा कि आज हजारों लोगों की मौजूदगी ने यह साबित कर दिया है कि युवाओं की आवाज सिर्फ इंटरनेट तक सीमित नहीं है. उन्होंने कहा कि कई लोग पूछते थे कि “कॉकरोच” केवल सोशल मीडिया पर दिखाई देते हैं, जमीन पर नहीं. आज जंतर-मंतर की भीड़ इस सवाल का जवाब है.

कॉकरोच व्यवस्था की सड़न का प्रतीक

अपने संगठन के नाम को लेकर उठने वाले सवालों पर अभिजीत दीपके ने कहा कि लोग अक्सर पूछते हैं कि वह खुद को “कॉकरोच” क्यों कहते हैं. उन्होंने कहा कि कॉकरोच वहां दिखाई देते हैं जहां व्यवस्था में गड़बड़ी और सड़न होती है. दीपके ने कहा, “अगर आज इतने कॉकरोच बाहर निकल रहे हैं तो यह हमारी नहीं, सिस्टम की गलती है.” उन्होंने इसे व्यवस्था की खामियों के खिलाफ जनता के प्रतिरोध का प्रतीक बताया.

प्रदर्शन में शामिल हुए सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुंग

जंतर मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन में शामिल होने लद्दाख के सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुंग भी पहुंचे. उन्होंने मंच से प्रदर्शन में शामिल लोगों को संबोधित करते हुए कहा,”मैं सद्भावना और शांति का संदेश लेकर आया हूं. आप सब लोगों ने शांति पूर्वक प्रदर्शन का यह तरीका चुना है इसके लिए आप बधाई के पात्र हैं. शिकायत का यह मुद्दा आपने चुना है. यहां प्रदर्शन नहीं आग्रह करने आये हैं. आगे हमें उम्मीद है सरकार सकारात्मक काम करेगी. इस्तीफे की बात हो रही है. लेकिन जिम्मेदारी की बात हो. हमें उम्मीद है कि सरकार सही कदम उठाएगी. आने वाले दिनों में जो हम मांग कर रहे हैं पूरा हो.” इस दौरान प्रदर्शन में शामिल लोगों ने एजुकेशन मिनिस्टर कैसा हो सोनम वांगचुक जैसा हो के नारे भी लगाए. इस दौरान वांगचुंग ने कहा कि पेपर लीक हो रहे हैं. इसलिए जिम्मेदारी तो तय करनी पड़ेगी. सरकार इस पर ध्यान दे.

शिक्षा मंत्रालय को जवाब देना होगा

प्रदर्शन में शामिल जेएनयू छात्र संघ की अध्यक्ष अदिति मिश्रा ने कहा कि आंदोलन का मुख्य उद्देश्य NTA और शिक्षा मंत्रालय की जवाबदेही तय कराना है. उन्होंने आरोप लगाया कि परीक्षा प्रणाली से जुड़े मामलों में लगातार विफलताएं सामने आई हैं और लाखों छात्रों का भविष्य प्रभावित हुआ है. उन्होंने कहा कि जब इतनी बड़ी संख्या में छात्रों के जीवन से जुड़े सवाल खड़े हों तो संबंधित मंत्रालय को जिम्मेदारी स्वीकार करनी चाहिए. उन्होंने कहा कि जवाबदेही तय किए बिना शिक्षा व्यवस्था में भरोसा बहाल नहीं किया जा सकता.

सरकार हमें महज कॉकरोच समझती

अदिति मिश्रा ने प्रदर्शन में लगे पोस्टरों का जिक्र करते हुए कहा कि वह इस बात को दर्शाते हैं कि सरकार आम छात्रों और युवाओं को किस नजर से देखती है. हालांकि, उन्होंने कहा कि “कॉकरोच” शब्द को अपमान नहीं बल्कि संघर्ष, सहनशीलता और जीवटता के प्रतीक के रूप में अपनाया है.

धर्मेंद्र प्रधान को हटाकर सक्षम व्यक्ति को जिम्मेदारी दी जाए

प्रदर्शनकारी शादाब ने कहा कि आंदोलन की सबसे प्रमुख मांग केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा है. उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री से अपील है कि शिक्षा मंत्रालय की जिम्मेदारी ऐसे व्यक्ति को दी जाए जो इस व्यवस्था को बेहतर ढंग से चला सके. उन्होंने कहा कि यह आंदोलन किसी राजनीतिक दल के समर्थन या विरोध में नहीं है, बल्कि शिक्षा व्यवस्था और छात्रों के भविष्य से जुड़े मुद्दों पर केंद्रित है.

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जवाबदेही की मांग के साथ खत्म हुआ प्रदर्शन

बता दें कि करीब पांच घंटे तक चले इस प्रदर्शन में छात्रों और युवाओं ने शिक्षा व्यवस्था में सुधार, परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने की मांग उठाई. जंतर-मंतर पर शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हुए इस प्रदर्शन के दौरान छात्र-युवाओं ने कहा कि उनकी लड़ाई किसी दल के खिलाफ नहीं, बल्कि शिक्षा व्यवस्था में जवाबदेही और सुधार के लिए है.

जंतर-मंतर पर जुटे GEN-Z के प्रदर्शन से कितना होगा बदलाव

भारतीय लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शनों का अपना एक गौरवशाली इतिहास रहा है. दिल्ली के जंतर-मंतर से लेकर रामलीला मैदान तक, समय-समय पर जन-आंदोलनों ने सत्ता की नींव को हिलाने और व्यवस्था में सुधार लाने का काम किया है. इसी फेहरिस्त में अन्ना हजारे के नेतृत्व में चला ‘इंडिया अगेंस्ट करप्शन’ आंदोलन एक मील का पत्थर माना जाता है. उस आंदोलन से निकली आम आदमी पार्टी (आप) ने यह सिद्ध किया कि एक जन-आंदोलन कैसे राजनीतिक दल का रूप ले सकता है और सत्ता के गलियारों तक पहुंच सकता है. लेकिन आज, जब देश भर में युवा बेरोजगारों और छात्रों के बीच ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (सीजेपी) जैसी नई राजनीतिक इकाइयों के उभरने की चर्चा है, तो यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या महज विरोध की आग से बनी पार्टियाँ देश में वास्तविक और दीर्घकालिक बदलाव ला सकती हैं? किसी भी जीवंत लोकतंत्र में जनता का सड़कों पर उतरना यह दर्शाता है कि संस्थागत तंत्र में कहीं न कहीं खामियां हैं. आज जब ‘कॉकरोच’ जैसे प्रतीकों के जरिए युवाओं के आक्रोश को राजनीति में बदलते देखते हैं, तो यह समझना होगा कि व्यवस्था परिवर्तन का रास्ता केवल नारेबाजी या चुनावी राजनीति से होकर नहीं गुजरता.

 

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