latest-newsदेश

हरीश द्विवेदी बीजेपी के लिए क्यों हो गए अहम, लगातार हो रहा प्रमोशन….अब मिली युवा मोर्चा प्रभारी की जिम्मेदारी

संवाददाता

नई दिल्ली। भारतीय जनता पार्टी में इन दिनों पूर्व सांसद और असम के प्रभारी हरीश द्विवेदी को लगातार महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां मिल रही हैं. हाल के दिनों में पार्टी ने उन्हें राष्ट्रीय महामंत्री की जिम्मेदारी सौंपी और इसके बाद अब भाजपा युवा मोर्चा के प्रभारी का दायित्व भी दिया गया है. इससे पहले राजस्थान में हुए निकाय चुनाव के दौरान भी पार्टी ने उन्हें प्रभारी बनाकर अहम जिम्मेदारी सौंपी थी.

एक के बाद एक मिल रही इन जिम्मेदारियों ने सियासी हलकों में चर्चा तेज कर दी है कि आखिर हरीश द्विवेदी पार्टी नेतृत्व के लिए इतने महत्वपूर्ण क्यों होते जा रहे हैं? क्या यह सिर्फ संगठनात्मक अनुभव और चुनावी क्षमता का परिणाम है या इसके पीछे उत्तर प्रदेश की राजनीति से जुड़ा कोई बड़ा सामाजिक समीकरण भी काम कर रहा है?

इन सवालों को समझने के लिए हरीश द्विवेदी के राजनीतिक सफर, संगठन में उनकी पकड़ और पूर्वांचल की सामाजिक-राजनीतिक संरचना को समझना जरूरी है.

कौन हैं हरीश द्विवेदी?

हरीश द्विवेदी का राजनीतिक सफर सीधे चुनावी राजनीति से नहीं, बल्कि छात्र राजनीति से शुरू हुआ. वर्ष 1991 में उन्होंने अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) के जरिए संगठनात्मक राजनीति में कदम रखा.

छात्र संगठन से जुड़ने के बाद उन्होंने लगातार संगठन के लिए काम किया और स्थानीय स्तर से प्रदेश स्तर तक अपनी पहचान बनाई. वर्ष 1993 से 1995 के बीच वे बस्ती के जिला प्रमुख रहे.

इसके बाद भाजपा युवा मोर्चा में भी उन्हें लगातार जिम्मेदारियां मिलती गईं. वर्ष 1994 से 1996 तक वे भाजयुमो के प्रदेश सह मंत्री रहे. इसके बाद वर्ष 2006 से 2010 तक प्रदेश उपाध्यक्ष और 2010 से 2013 तक प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी संभाली.

इस सफर से एक बात साफ होती है कि हरीश द्विवेदी की राजनीतिक पहचान केवल चुनाव लड़ने वाले नेता की नहीं है. उन्होंने संगठन की विभिन्न सीढ़ियों पर काम किया है. यही अनुभव भाजपा जैसी कैडर आधारित पार्टी में किसी नेता की उपयोगिता को बढ़ाता है.

2012 में चुनावी राजनीति में पहली कोशिश

संगठन में लंबे समय तक काम करने के बाद हरीश द्विवेदी ने वर्ष 2012 में पहली बार विधानसभा चुनाव के जरिए प्रत्यक्ष चुनावी राजनीति में उतरने की कोशिश की. हालांकि उन्हें उस चुनाव में सफलता नहीं मिली.

लेकिन चुनावी हार उनके राजनीतिक सफर में बड़ी बाधा नहीं बनी. संगठन में सक्रियता जारी रही और पार्टी ने अगले लोकसभा चुनाव में उन्हें बड़ा मौका दिया.

2014 में पहली बार पहुंचे संसद
वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने हरीश द्विवेदी को टिकट दिया. उन्होंने चुनाव में जीत हासिल की और पहली बार संसद पहुंचे.

इसके बाद वर्ष 2019 में भी पार्टी ने उन पर भरोसा जताया और उन्हें लोकसभा चुनाव का टिकट दिया. उन्होंने एक बार फिर जीत दर्ज की.

दो लोकसभा चुनावों में सफलता ने पार्टी के भीतर उनकी राजनीतिक स्थिति को मजबूत किया. खास तौर पर यह बात महत्वपूर्ण रही कि वे संगठन और चुनावी राजनीति, दोनों का अनुभव रखने वाले नेता के तौर पर उभरे.

सांसद नहीं रहे, लेकिन संगठन में बढ़ती रही भूमिका

राजनीति में किसी नेता की अहमियत केवल उसके सांसद या विधायक होने से तय नहीं होती. भाजपा जैसे संगठन में संगठनात्मक जिम्मेदारियां भी उतनी ही महत्वपूर्ण मानी जाती हैं.

हरीश द्विवेदी का मामला इसका उदाहरण है. संसद की राजनीति के बाद भी पार्टी में उनकी भूमिका खत्म नहीं हुई, बल्कि संगठनात्मक जिम्मेदारियां लगातार मिलती रहीं.

असम के प्रभारी के रूप में काम करना और राजस्थान के निकाय चुनाव की जिम्मेदारी संभालना यह संकेत देता है कि पार्टी अलग-अलग राज्यों के राजनीतिक और संगठनात्मक समीकरणों को संभालने के लिए उन पर भरोसा करती रही है. अब राष्ट्रीय महामंत्री और भाजपा युवा मोर्चा के प्रभारी की जिम्मेदारी मिलने से उनकी भूमिका और व्यापक हो गई है.

आखिर पार्टी को उनमें क्या दिखता है?

हरीश द्विवेदी को लगातार जिम्मेदारियां मिलने की पहली वजह उनका लंबा संगठनात्मक अनुभव माना जा सकता है. छात्र राजनीति से लेकर भाजयुमो और फिर पार्टी के बड़े संगठनात्मक पदों तक का अनुभव उन्हें जमीनी संगठन की समझ देता है.

दूसरी वजह उनकी चुनावी पृष्ठभूमि है. वे खुद दो बार लोकसभा चुनाव जीत चुके हैं. ऐसे में चुनावी प्रबंधन, कार्यकर्ताओं के साथ संवाद और राजनीतिक माहौल को समझने का उनका अनुभव पार्टी के लिए उपयोगी हो सकता है.

तीसरी अहम बात युवा संगठन से उनका पुराना जुड़ाव है. भाजपा युवा मोर्चा में प्रदेश अध्यक्ष तक की जिम्मेदारी संभाल चुके नेता के रूप में वे युवाओं और पार्टी के युवा कैडर के बीच संगठनात्मक नेटवर्क को समझते हैं.

क्या ब्राह्मण समीकरण भी है वजह?

हरीश द्विवेदी को लगातार मिल रही जिम्मेदारियों के बीच उत्तर प्रदेश के सामाजिक समीकरण की चर्चा भी स्वाभाविक है. खासकर पूर्वांचल की राजनीति में ब्राह्मण मतदाताओं की भूमिका को लंबे समय से महत्वपूर्ण माना जाता रहा है.

राजनीतिक चर्चाओं में यह दावा अक्सर सामने आता रहा है कि उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण समाज के एक हिस्से में सरकार को लेकर नाराजगी है. हालांकि इस तरह के दावों को एक समान और पूरे समुदाय पर लागू करना सही नहीं होगा, क्योंकि किसी भी बड़े सामाजिक समूह का राजनीतिक रुझान एक जैसा नहीं होता.

फिर भी चुनावी राजनीति में किसी प्रभावशाली सामाजिक वर्ग की धारणा और उसके बीच राजनीतिक प्रतिनिधित्व का सवाल महत्वपूर्ण होता है. इसी संदर्भ में हरीश द्विवेदी को मिल रही लगातार जिम्मेदारियों को कुछ राजनीतिक विश्लेषक ब्राह्मण प्रतिनिधित्व के नजरिए से भी देखते हैं.

पूर्वांचल में क्यों महत्वपूर्ण है ब्राह्मण वोट?

पूर्वी उत्तर प्रदेश यानी पूर्वांचल लंबे समय से सामाजिक और राजनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण क्षेत्र रहा है. वाराणसी, गोरखपुर, जौनपुर, देवरिया, बस्ती, संत कबीर नगर और महाराजगंज जैसे जिलों की राजनीति में ब्राह्मण समुदाय की मौजूदगी महत्वपूर्ण मानी जाती है.

इसलिए किसी एक आंकड़े के आधार पर पूरे पूर्वांचल के राजनीतिक व्यवहार को समझना उचित नहीं होगा. फिर भी यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि पूर्वांचल में चुनावी मुकाबले अक्सर बहुकोणीय होते हैं. ऐसे में किसी भी सामाजिक समूह का छोटा लेकिन प्रभावशाली वोट शेयर कई सीटों पर चुनावी नतीजे प्रभावित कर सकता है.

युवा मोर्चा की जिम्मेदारी का अलग महत्व

भाजपा युवा मोर्चा का प्रभारी बनाया जाना भी हरीश द्विवेदी की राजनीतिक भूमिका को समझने के लिए अहम है. युवा मतदाता अब चुनावी राजनीति का बड़ा हिस्सा हैं और राजनीतिक दलों के लिए युवाओं तक पहुंच बनाना लगातार महत्वपूर्ण होता जा रहा है.

डिजिटल प्लेटफॉर्म, रोजगार, शिक्षा, स्टार्टअप, प्रतियोगी परीक्षाएं और नए अवसर जैसे मुद्दे युवाओं के बीच राजनीतिक चर्चा का हिस्सा हैं.

ऐसे में युवा संगठन को मजबूत करने के लिए ऐसे नेता की जरूरत होती है, जिसे संगठन और चुनाव दोनों का अनुभव हो. हरीश द्विवेदी का भाजयुमो से पुराना रिश्ता इस जिम्मेदारी में उनके लिए अतिरिक्त उपयोगी साबित हो सकता है.

राष्ट्रीय महामंत्री बनने से बढ़ा कद

राष्ट्रीय महामंत्री का पद भाजपा संगठन में बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है. यह जिम्मेदारी मिलने का अर्थ है कि पार्टी नेतृत्व किसी नेता को व्यापक संगठनात्मक काम के लिए भरोसेमंद मानता है.

अब युवा मोर्चा की जिम्मेदारी भी उनके पास आने से उनका काम संगठन की अगली पीढ़ी और पार्टी के व्यापक ढांचे के बीच तालमेल बनाने से जुड़ सकता है.

इससे यह भी संकेत मिलता है कि पार्टी उन्हें केवल उत्तर प्रदेश तक सीमित नेता के रूप में नहीं देख रही, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर संगठनात्मक जिम्मेदारियों के लिए इस्तेमाल करना चाहती है.

आगे क्या हो सकती है भूमिका?

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि आने वाले समय में भाजपा हरीश द्विवेदी की भूमिका का कितना विस्तार करती है. राष्ट्रीय महामंत्री और युवा मोर्चा प्रभारी के तौर पर उनके सामने संगठन को मजबूत करने की बड़ी जिम्मेदारी होगी.

विशेष रूप से उत्तर प्रदेश जैसे राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण राज्य में पार्टी के सामाजिक समीकरणों को लेकर उनकी भूमिका पर नजर रहेगी. साथ ही अन्य राज्यों में चुनावी और संगठनात्मक जिम्मेदारियां मिलने की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता.

संगठन, चुनाव और सामाजिक समीकरण का संगम

कुल मिलाकर हरीश द्विवेदी का राजनीतिक सफर छात्र राजनीति से शुरू होकर लोकसभा और फिर भाजपा के राष्ट्रीय संगठन तक पहुंचा है. दो बार सांसद रह चुके द्विवेदी ने संगठन में भी लंबा समय बिताया है. यही वजह है कि पार्टी उन्हें अलग-अलग स्तरों पर लगातार आजमा रही है.

अब राष्ट्रीय महामंत्री और युवा मोर्चा प्रभारी के तौर पर उनकी नई भूमिका यह तय करेगी कि वे पार्टी के संगठनात्मक विस्तार और चुनावी रणनीति में कितना प्रभाव डाल पाते हैं. आने वाले चुनावों में उनकी सक्रियता यह भी बताएगी कि भाजपा ने उनके राजनीतिक अनुभव को किस तरह बड़े चुनावी समीकरण में इस्तेमाल करने की रणनीति बनाई है.

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
WP2Social Auto Publish Powered By : XYZScripts.com