
संवाददाता
नई दिल्ली। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने झूठ, जातीय विभाजन, दलित और मुस्लिम तुष्टिकरण को अपना सियासी मंत्र बना लिया है। वहीं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, वीर सावरकर, मनुस्मृति और सनातन का अपमान उनका पैशन बन चुका है। इसके जरिए वो केंद्र की सत्ता में आना चाहते हैं। लेकिन राहुल गांधी के आधारहीन बयानों और अपमानजनक टिप्पणियों की वजह से देश की अलग-अलग अदालतों में कई मामले चल रहे हैं। चाहे मामला ‘चौकीदार चोर है’ से जुड़ा हो या ‘खड़गे शुद्धिकरण’ से, झूठ की गूंज ज्यादा देर तक टिकती नहीं है। बिना पुख्ता तथ्यों के ‘झूठ की गूंज की मियाद’ बहुत छोटी और सीमित होती है, क्योंकि सच सामने आते ही झूठ का अस्तित्व खत्म हो जाता है। इसलिए पिछले दो दिनों में राहुल गांधी को दो उच्च न्यायालयों से तगड़ा झटका लगा है।

बॉम्बे हाईकोर्ट ने खोली राहुल गांधी के झूठ की पोल
बॉम्बे हाईकोर्ट ने मंगलवार (8 सितंबर) को राहुल गांधी के खिलाफ आपराधिक मानहानि का मामला रद्द करने से इनकार किया। यह मामला प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को “चोरों के सरदार” और “कमांडर-इन-थीफ” (चोरों का कमांडर) कहने वाली उनकी कथित टिप्पणियों से जुड़ा है। राहुल गांधी ने इस मामले में मजिस्ट्रेट कोर्ट के समन को चुनौती दी और तर्क दिया कि बीजेपी कार्यकर्ता द्वारा दायर शिकायत सुनवाई योग्य नहीं है। उन्होंने दावा किया कि उन्होंने पार्टी का नाम नहीं लिया था और किसी “पहचान योग्य या निश्चित वर्ग” को निशाना नहीं बनाया। ऐसे में कोई स्पष्ट पीड़ित व्यक्ति या समूह नहीं है जिसके पास मुकदमा चलाने का अधिकार (लोकस स्टैंडी) हो।
राहुल के खिलाफ मानहानि केस रद्द करने से इनकार
सिंगल-जज जस्टिस नितिन बोरकर ने राहुल गांधी की दलील को खारिज करते हुए कहा कि एक रजिस्टर्ड राष्ट्रीय राजनीतिक पार्टी होने के नाते, बीजेपी निश्चित रूप से एक पहचान योग्य संस्था है। जज ने कहा, “शिकायतकर्ता का कहना है कि वह दो दशकों से बीजेपी का सक्रिय सदस्य रहा है। प्रधानमंत्री, जो बीजेपी के सदस्य हैं, उन्हें ‘कमांडर-इन-थीफ’ बताने वाले बयान को पहली नज़र में देखने पर यह नहीं कहा जा सकता कि यह टिप्पणी केवल पार्टी के वरिष्ठ नेतृत्व तक ही सीमित है। आरोप का असल मतलब क्या था और इसका पार्टी के सदस्यों पर क्या असर पड़ेगा, इस पर ट्रायल के दौरान विचार किया जाएगा। इसलिए यह कोर्ट विद्वान मजिस्ट्रेट द्वारा पारित आदेश में कोई गैर-कानूनी बात नहीं पाती है।”
कोर्ट ने शशि थरूर के मामले में फैसले का दिया हवाला
बॉम्बे हाईकोर्ट ने शशि थरूर के मामले में दिए गए फैसले का हवाला दिया, जिसमें दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा था कि कोई राजनीतिक पार्टी अपने रजिस्ट्रेशन के कारण एक पहचान योग्य और निश्चित संस्था होती है। बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा कि इस मामले में यह तय किया जाना बाकी है कि कथित बयान का वास्तविक आशय क्या था और उसका पार्टी के सदस्यों पर क्या प्रभाव पड़ा। इन सवालों पर ट्रायल के चरण में विचार किया जाएगा। बता दें कि इस साल फरवरी में कांग्रेस नेता की याचिका पर शिकायतकर्ता, राहुल गांधी और महाराष्ट्र सरकार की दलीलें सुनने के बाद मामले में आदेश सुरक्षित रख लिया था।
बीजेपी कार्यकर्ता ने की थी मानहानि की शिकायत
गौरतलब है कि यह शिकायत बीजेपी के कार्यकर्ता महेश श्रीश्रीमाल ने मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट के सामने दर्ज कराई थी। शिकायतकर्ता का तर्क था कि राहुल गांधी की टिप्पणियां प्रधानमंत्री और उनके ज़रिए सत्ताधारी पार्टी और उसके सदस्यों पर निशाना साधने के लिए थीं, जिससे उनकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा। उनके अनुसार, प्रधानमंत्री मोदी को “चोरों का सरदार” कहने का मतलब असल में सभी बीजेपी सदस्यों को “चोर” बताना था, जिससे पार्टी कार्यकर्ताओं को मानहानि की कार्यवाही शुरू करने का अधिकार मिला। महेश श्रीश्रीमाल की शिकायत पर मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट ने राहुल गांधी को समन जारी किया था।
राहुल गांधी की ओर से क्या दलील दी गई?
मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट के समन और कार्यवाही जारी रखने को चुनौती देते हुए राहुल गांधी ने हाईकोर्ट का रुख किया और दलील दी कि शिकायत कानूनी रूप से मान्य नहीं है। उनकी ओर से पेश हुए सीनियर एडवोकेट सुदीप पासबोला ने कहा कि राहुल गांधी ने ट्वीट में बीजेपी या किसी राजनीतिक पार्टी का नाम नहीं लिया था और न ही किसी “पहचान योग्य या निश्चित समूह” को निशाना बनाया था। पासबोला ने तर्क दिया कि किसी स्पष्ट रूप से पीड़ित व्यक्ति या समूह के न होने पर शिकायतकर्ता के पास मुकदमा चलाने का अधिकार (लोकस स्टैंडी) नहीं था। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि केवल यह अर्थ निकालना कि बयान पार्टी कार्यकर्ताओं पर लागू होता है, आपराधिक मानहानि की कार्यवाही का आधार नहीं बन सकता। लेकिन सीनियर एडवोकेट सुदीप पासबोला की ये दलीलें राहुल गांधी को राहत दिलाने में नाकाम रहीं।
खड़गे शुद्धिकरण मामला : सबूत नहीं दे पाई कांग्रेस
उधर, उत्तराखंड हाईकोर्ट ने सोमवार (7 सितंबर) को हल्द्वानी खड़गे शुद्धिकरण मामले में राहुल गांधी और कांग्रेस को बड़ा झटका दिया। हाईकोर्ट ने मामले की स्वतंत्र जांच से जुड़ी याचिका खारिज कर दी। हाईकोर्ट ने राहुल गांधी के झूठ की गूंज की पोल खोलते हुए कहा कि आरोपों के समर्थन में कांग्रेस कोई सबूत नहीं दे पाई। हाईकोर्ट ने पुलिस की जांच पर संतोष जताते हुए इसमें किसी तरह के दखल देने से इनकार कर दिया। राज्य सरकार की ओर से निष्पक्ष जांच के आश्वासन के बाद मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार तिवारी और न्यायमूर्ति सिद्धार्थ साह की खंडपीठ ने कहा कि इस स्तर पर किसी अतिरिक्त न्यायिक निर्देश की जरूरत नहीं है। खंडपीठ ने कहा कि एफआईआर दर्ज होने दीजिए, पुलिस को अपना काम करने दीजिए।
उत्तराखंड हाईकोर्ट ने खारिज की स्वतंत्र जांच की मांग
गौरतलब है कि देहरादून निवासी सामाजिक कार्यकर्ता बैजनाथ की ओर से हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की गई है। याचिका में कहा गया है कि सभा के उपरांत सार्वजनिक रूप से वैदिक मंत्रोच्चार के साथ गंगाजल छिड़ककर शुद्धिकरण किए जाने से समाज में वैमनस्यता फैलने की आशंका बढ़ गई है। इस घटनाक्रम को लेकर विभिन्न पक्षों की ओर से अलग-अलग स्पष्टीकरण और धार्मिक बयानबाजी सामने आई थी, जिसके बाद कांग्रेस पार्टी ने भी इस मुद्दे पर राज्यपाल को ज्ञापन सौंपा था। याचिका में कहा गया है कि हल्द्वानी में शुद्धिकरण करने वालों की एफआईआर तो दर्ज कर ली गई, लेकिन कांग्रेसियों की एफआईआर दर्ज नहीं की गई।
जनहित याचिका राजनीतिक रूप से प्रेरित-एडवोकेट जनरल
उत्तराखंड सरकार की ओर से पेश एडवोकेट जनरल ने कोर्ट को बताया कि दोनों पक्षों की ओर से एफआईआर दर्ज कराई जा चुकी है और मामले की जांच पहले से ही चल रही है। राज्य ने जनहित याचिका का विरोध करते हुए आरोप लगाया कि यह राजनीतिक रूप से प्रेरित है। राज्य सरकार की तरफ से कोर्ट को बताया गया कि मामले में 2 एफआईआर दर्ज हुई हैं। इनमें एक हल्द्वानी में और दूसरी मीडिया में छपी खबर के आधार पर जीरो एफआईआर बेंगलुरु में दर्ज हुई है। बेंगलुरू में दर्ज हुई एफआईआर जांच के लिए हल्द्वानी में ट्रांसफर कि जानी है। सरकार ने कोर्ट को आश्वस्त किया है कि पुलिस मामले में निष्पक्ष जांच करेगी।
संसद मार्ग थाने में FIR दर्ज कराने पहुंचे कांग्रेस के दलित और आदिवासी सांसद
‘खड़गे शुद्धिकरण’ के खिलाफ कांग्रेस के दलित और आदिवासी सांसद 8 सितंबर को संसद मार्ग थाने में FIR दर्ज कराने पहुंचे। सूत्रों के अनुसार, कांग्रेस के दलित और आदिवासी सांसदों ने ‘खड़गे शुद्धिकरण’ मामले में एफआईआर दर्ज नहीं होने को लेकर राष्ट्रपति से मुलाकात का समय मांगा है। अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) समुदायों से ताल्लुक रखने वाले कांग्रेस के 32 सांसद 9 सितंबर को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से मुलाकात करेंगे। इस दौरान वे पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की रैली के स्थल पर कथित रूप से किए गए “शुद्धिकरण यज्ञ” के खिलाफ कार्रवाई की मांग को लेकर एक ज्ञापन सौंपेंगे। दरअसल, कांग्रेस यूपी सहित पांच राज्यों की विधानसभा चुनाव से दलितों का वोट हासिल करने के लिए इसे सियासी मुद्दा बनाना चाहती है।



