
संवाददाता
नई दिल्ली। भारत और फ्रांस के बीच 114 राफेल लड़ाकू विमानों की मेगा डील को लेकर बड़ा अपडेट सामने आया है. भारतीय वायुसेना की ताकत बढ़ाने के लिए एयर चीफ मार्शल एपी सिंह तीन दिनों के फ्रांस दौरे पर हैं. यहां वे राफेल बनाने वाली कंपनी डसॉल्ट एविएशन समेत रक्षा उद्योग के प्रमुख अधिकारियों से मुलाकात करेंगे. खबर है कि भारत जल्द ही इन 114 राफेल फाइटर जेट्स की खरीद के लिए फ्रांस को औपचारिक लेटर ऑफ रिक्वेस्ट (LoR) सौंप सकता है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रस्तावित फ्रांस यात्रा और जी-7 शिखर सम्मेलन से पहले दोनों देशों के बीच इस सौदे को लेकर बातचीत में तेजी देखी जा रही है.
दरअसल भारतीय वायुसेना लंबे समय से लड़ाकू विमानों की कमी से जूझ रही है. वायुसेना की आवश्यकता 42 फाइटर स्क्वाड्रन की मानी जाती है, लेकिन वर्तमान में उसके पास केवल 29 स्क्वाड्रन ही एक्टिव हैं. चीन और पाकिस्तान जैसे दो मोर्चों पर संभावित चुनौती को देखते हुए यह कमी रणनीतिक चिंता का विषय बनी हुई है.
ऑपरेशन सिंदूर से सीखा सबक
रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान सामने आए अनुभवों ने भी इस आवश्यकता को और अधिक साफ कर दिया. मई 2025 में हुए इस ऑपरेशन के दौरान भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान और उसके कब्जे वाले कश्मीर में स्थित आतंकी ठिकानों पर लंबी दूरी से सटीक हमले किए थे. इन हमलों में राफेल विमानों ने SCALP क्रूज मिसाइल और HAMMER प्रिसिजन गाइडेड हथियारों के जरिए अहम भूमिका निभाई थी.
भारतीय वायुसेना के वरिष्ठ अधिकारियों ने ऑपरेशन के बाद सार्वजनिक रूप से माना था कि राफेल उस अभियान का सबसे प्रभावी प्लेटफॉर्म साबित हुआ.
पाकिस्तान की कमजोरी भी आई सामने
ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत ने बिना सीमा पार किए पाकिस्तान के अंदर स्थित कई अहम ठिकानों को निशाना बनाया. इससे यह स्पष्ट हुआ कि आधुनिक लंबी दूरी की मिसाइलों और लड़ाकू विमानों के सामने पाकिस्तान की सीमित रणनीतिक गहराई (Strategic Depth) उसकी बड़ी कमजोरी बन सकती है.
रक्षा विश्लेषकों के अनुसार भारतीय सेना ने इस अभियान में यह दिखा दिया कि वह दुश्मन के एयरबेस, रडार स्टेशन और कमांड सेंटर को दूर से ही निशाना बना सकती है. यही वजह है कि अब वायुसेना अपनी संख्या और तकनीकी बढ़त दोनों को मजबूत करना चाहती है.
राफेल में अपना ब्रह्मोस क्यों जोड़ना चाहता है भारत?
राफेल डील में सबसे बड़ा मुद्दा कीमत नहीं, बल्कि तकनीकी नियंत्रण को लेकर है. भारत चाहता है कि उसे राफेल के इंटरफेस कंट्रोल डॉक्यूमेंट्स (ICDs) तक पहुंच मिले. ये वे तकनीकी दस्तावेज होते हैं, जो बताते हैं कि विमान के कंप्यूटर, सेंसर और हथियार प्रणाली आपस में कैसे कनेक्ट करते हैं.
भारत का तर्क है कि अगर उसे इन दस्तावेजों तक पहुंच मिलती है तो वह बिना डसॉल्ट की मंजूरी के अपने स्वदेशी हथियारों को राफेल में जोड़ सकेगा. इनमें अस्त्र बीवीआर, ब्रह्मोस-एनजी मिसाइलों के अलावा दूसरे भारतीय हथियार शामिल हैं.
भारतीय रक्षा योजनाकारों का मानना है कि इससे राफेल पर विदेशी निर्भरता कम होगी और भविष्य में अपग्रेड करना आसान होगा.
क्यों हिचक रहा है फ्रांस?
फ्रांस इस मामले में पूरी तरह सहमत नहीं दिख रहा. फ्रांसीसी रक्षा पोर्टल ओपेक्स न्यूज की रिपोर्ट्स के मुताबिक, पेरिस राफेल के सोर्स कोड और सॉफ्टवेयर आर्किटेक्चर तक पहुंच देने को तैयार नहीं है.

34 अरब यूरो का मेगा प्रोजेक्ट
योजना के मुताबिक शुरुआती 24 विमान सीधे फ्रांस से भारत को दिए जाएंगे, ताकि तत्काल जरूरत पूरी की जा सके. इसके बाद लगभग 90 विमानों का निर्माण भारत में किया जाएगा. सूत्रों के अनुसार स्थानीय उत्पादन का लक्ष्य करीब 50 प्रतिशत तक रखा गया है. इससे भारत के रक्षा उत्पादन और ‘मेक इन इंडिया’ अभियान को भी बड़ा बढ़ावा मिलेगा.
रक्षा विश्लेषकों के मुताबिक पाकिस्तान आने वाले वर्षों में चीन से लगभग 40 J-35 स्टील्थ लड़ाकू विमान हासिल कर सकता है. ऐसे में भारतीय वायुसेना अपनी तकनीकी बढ़त बनाए रखना चाहती है.
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