
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के जन्मदिन पर जानिए उनसे संबंधित रोचक बातें
संवाददाता
नई दिल्ली। गुजरात के वडनगर में जन्मे नरेंद्र मोदी आज (17 सितंबर) को 76 वर्ष के हो गए हैं। प्रधानमंत्री मोदी की राजनीतिक यात्रा पर तो हजारों पन्ने लिखे जा चुके हैं, लेकिन उनकी जिंदगी के कुछ छोटे-छोटे किस्से ऐसे हैं जो किसी राजनीतिक भाषण से ज्यादा उनके मासूम बचपन और समझदार व्यक्तित्व की स्पष्ट झलक देते हैं। रेलवे स्टेशन पर चाय बेचने वाला बच्चा, स्कूल के बचे हुए चाक से अपने सफेद जूते चमकाने की तरकीब निकालने वाला विद्यार्थी, मंच पर अभिनय करने वाला किशोर, तालाब में तैरने और किताबें पढ़ने का शौकीन लड़का और फिर घर से निकलकर देश को समझने की कोशिश करने वाला युवक नरेंद्र मोदी की कहानी के ये छोटे अध्याय आज भी खासे दिलचस्प हैं। पीएम मोदी से जुड़े किस्सों को लोग आज भी शिद्दत से याद करते हैं। उनकी जीवनी में भी वडनगर के बचपन, परिवार की सीमित आर्थिक स्थिति, चाय की दुकान पर मदद और पढ़ने की रुचि का पता चलता है। बचपन की सादगी और बाद के सार्वजनिक जीवन की चमक के बीच कई ऐसे किस्से हैं जिनमें मेहनत, जुगाड़, जिज्ञासा, दोस्ती, शिक्षक, किताबें और यादें साथ-साथ चलती हैं। जन्मदिन के मौके पर इन्हीं किस्सों को जोड़कर देखें तो यह सिर्फ प्रधानमंत्री की राजनीतिक यात्रा नहीं, बल्कि वडनगर के एक बच्चे की उन छोटी आदतों की कहानी भी बन जाती है, जिनकी यादें आज तक उनके साथ चली आई हैं।
जानते हैं बाल्यकाल से लेकर अब तक पीएम नरेन्द्र मोदी के जीवनकाल के कुछ दिलचस्प और रोचक किस्सों पर एक नजर डालते हैं….
किस्सा नंबर 1 : चमकदार केतली में आती थी ‘मोदीजी की चाय’
कोटा निवासी 73 वर्षीय सुधा शर्मा ने मीडिया से बातचीत में अपने बचपन की वह याद साझा की। जब वह वर्ष 1957-58 में पांचवीं कक्षा में पढ़ती थीं। सुधा बताती हैं कि वडनगर में नरेंद्र मोदी के परिवार की चाय की दुकान से उनके पिता के लिए चाय आती थी। उनके पिता वडनगर रेलवे स्टेशन पर स्टेशन मास्टर थे और रेलवे की बैटरी रूम में बैठकर चाय पीते थे। सुधा के मुताबिक चांदी जैसी चमकदार केतली में चाय आती थी और उस समय उनके पिता के साथ बैठकर चाय पीने की वह छोटी-सी बात आज भी उनके जेहन में ताजा है। उनके अनुसार नरेंद्र मोदी के पिता दामोदरदास रेलवे स्टेशन पर स्टेशन मास्टर के तौर पर कार्यरत उनके पिता के लिए चाय पहुंचाते थे और मोदी परिवार के दूसरे सदस्य भी बचपन में इसी दुकान पर चाय बनाकर बेचते थे।किस्सा नंबर 2 : कोटा में आज भी जिंदा वडनगर की चाय की मिठास
सुधा शर्मा बताती हैं कि उनके पिता को उस दुकान की चाय खास पसंद थी और बचपन की वह याद उनके साथ आज तक चली आ रही है। वह कहती हैं कि जब भी वडनगर जाती हैं तो उस जगह को जरूर देखती हैं, जहां कभी मोदी परिवार की चाय की दुकान हुआ करती थी। पांचवीं कक्षा तक गुजराती माध्यम से पढ़ी सुधा के लिए वडनगर केवल एक शहर नहीं, बल्कि पिता की नौकरी और अपने बचपन की स्मृतियों से जुड़ी जगह है। यही वजह है कि दशकों बाद भी चमकदार केतली में आती वह चाय उनके लिए महज चाय नहीं, बल्कि उस दौर की एक ऐसी याद है, जिसमें आज के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के परिवार की साधारण चाय की दुकान और उनके अपने परिवार की जिंदगी का एक छोटा-सा रिश्ता जुड़ा हुआ है।
किस्सा नंबर 3 : ज्योतिषी ने कहा था, यह बच्चा बड़ा आदमी बनेगा
वडनगर में चौथी से 11 कक्षा तक उनके साथ पढ़ाई कहने वाले सहपाठी ईश्वरभाई पटेल को आज भी बचपन का वह नरेन्द्र याद है। पढ़ाई में तेज, खेलों में आगे, नाटक और सांस्कृतिक गतिविधियों में सक्रिय और जरूरतमंदों की मदद के लिए तत्पर। वे बताते हैं कि बचपन में नरेंद्र मोदी को अपने गांव के एक ज्योतिषी को दिखाया। उसने कहा था कि यह बच्चा आगे चलकर महान व्यक्ति बनेगा। ऐसी भविष्यवाणी को ऐतिहासिक रूप से सच साबित हुई। 1967 में पटेल ने कालेज छोड़ दिया। पटेल के मुताबिक इतना बड़ा आदमी बनने के बाद भी मोदी के व्यवहार में पुराने मित्रों और शिक्षकों के प्रति की बदलाव नहीं आया। इस किस्से की दिलचस्पी इस बात में है कि बचपन के नरेंद्र को जानने वाले लोग वर्षों बाद भी उनके व्यक्तित्व की विशेषताओं को कैसे याद करते हैं।
किस्सा नंबर 4 : बाढ़ आई तो चाय की दुकान लगाने का आइडिया
वडनगर रेलवे स्टेशन उनके बचपन की कहानी का महत्वपूर्ण हिस्सा है। परिवार की चाय की दुकान थी और स्कूल के दिनों में नरेंद्र भी पिता के काम में हाथ बंटाते थे। जब ट्रेन प्लेटफॉर्म पर रुकती तो यात्रियों को चाय देने का काम भी करते थे। बाद में उन्होंने बताया कि यात्रियों से बातचीत करते हुए उन्हें अलग-अलग तरह के लोगों को समझने का अवसर मिला। एक छोटे शहर के रेलवे प्लेटफॉर्म पर खड़ा वह बच्चा शायद तब नहीं जानता था कि वर्षों बाद उसकी जिंदगी का बड़ा हिस्सा ही लोगों से संवाद करने में बीतेगा। किशोर नरेंद्र से जुड़ी एक कहानी बाढ़ राहत से संबंधित है। उन्होंने अपने दोस्तों के साथ मिलकर मेले में चाय की दुकान लगाने का विचार किया, ताकि उससे मिलने वाली राशि राहत कार्य में दी जा सके। जब साधन कम हों तो अपनी छोटी-सी क्षमता को सामूहिक प्रयास में बदल देना।
किस्सा नंबर 5 : स्कूल की किताबों से ज्यादा दिलचस्प था पुस्तकालय
उनके पुराने सहपाठियों के संस्मरणों में पढ़ने और बहस करने की उनकी रुचि का उल्लेख मिलता है। आधिकारिक जीवनी में भी कहा गया है कि नरेंद्र मोदी स्थानीय पुस्तकालय में काफी समय बिताते थे और उन्हें किताबें पढ़ने तथा बहस करने में दिलचस्पी थी। यानी चाय की दुकान के बाद उनकी दुनिया केवल रेलवे स्टेशन तक सीमित नहीं थी। किताबों के पन्नों में भी वह दुनिया तलाशते थे, जो वडनगर की गलियों से कहीं भी हों।
किस्सा नंबर 6 : मंच पर नरेंद्र मोदी और दस मिनट तक तालियां
स्कूल के दिनों में नाटक उनके जीवन का अहम हिस्सा था। हाल में उनके पुराने शिक्षक एच.सी. पटेल ने उनके स्कूल के दिनों को याद करते हुए बताया कि नरेंद्र मोदी ने जोगीदास खुमाण की भूमिका निभाई थी और उनके अभिनय के बाद दर्शकों ने लंबे समय तक तालियां बजाईं। एक अन्य चर्चित प्रसंग ‘पीला फूल’ नामक एकांकी से जुड़ा है। यह नाटक छुआछूत जैसे सामाजिक मुद्दे पर आधारित था और इसके मंचन से स्कूल की टूटी दीवार की मरम्मत के लिए धन जुटाने की कोशिश की गई थी। यानी मंच उनके लिए सिर्फ अभिनय की जगह नहीं था; सामाजिक मुद्दों को अभिव्यक्त करने का माध्यम भी था।
किस्सा नंबर 7 : जोशीले और अच्छे तैराक मगरमच्छ के बच्चे को घर ले आए
नरेन्द्र मोदी में बचपन से ही गुणी रहे हैं। उन्हें साइंस और इतिहास विषय काफी पसंद रहे हैं। वे कई तरह की पाठ्येत्तर गतिविधियों में माहिर रहे। पढ़ाई में अच्छा होने के साथ-साथ वे शेरो-शायरी के लिए भी जाने जाते थे। आज भी उनके भाषणों में इसका असर दिखता है। उनके स्कूल में उनकी आवाज और अभिनय कला की भी चर्चा होती थी। इतना ही नहीं मोदी बचपन से ही एक अच्छे तैराक भी रहे हैं। बालक नरेन्द्र के बचपन का यह किस्सा भी शानदार है। वे अपने बचपन के दोस्त के साथ शर्मिष्ठा सरोवर गए थे और वहां से एक मगरमच्छ के बच्चे को ही पकड़ ले आए थे। तब उनकी मां हीरा बा ने उन्हें समझाया था कि बच्चे को मां से अलग कर देना, कितनी बुरी बात है। मां की बात समझने पर वे वापस मगरमच्छ के बच्चे को सरोवर छोड़ आए।
किस्सा नंबर 8 : सैनिकों को चाय पिलाने वाले बच्चे की संन्यासी बनने की ख्वाहिश
भारत-पाक युद्ध के दौर से जुड़ा एक प्रसंग भी नरेंद्र मोदी की आधिकारिक जीवन-कथा में मिलता है। इसके अनुसार वडनगर रेलवे स्टेशन पर वे आने-जाने वाले सैनिकों को चाय पिलाते थे। वैसे, दुनियावी माया-मोह से नरेन्द्र को बचपन से ही लगाव नहीं था। ईश्वर के प्रति उनकी बेहद आसक्ति थी, जो आज भी उनके कामों में नजर आती है। माया-मोह से विरक्ति के चलते मोदी बचपन से ही संन्यासी बनना चाहते थे। नरेन्द्र को बचपन से साधु जीवन और संन्यास बहुत पसंद था। एक बार तो वे घर छोड़कर भी चले गए थे। भाई-बहनों के परिवार में नरेन्द्र का बचपन गरीबी में गुजरा। बडनगर रेलवे स्टेशन पर उनके पिता की चाय की दुकान थी और वे स्कूल से आने के बाद चाय बेचा करते थे। वे युवावस्था की दहलीज पर थे और महज 17 वर्ष की उम्र में घर छोड़ वे अपनी आध्यात्मिक यात्रा पर निकल गए थे।
किस्सा नंबर 9 : मोह लेने वाली वक्तृत्व कला, भाषणों में दिखता है ज्ञान और विजन
नरेन्द्र की स्कूली पढ़ाई बडनकर में ही हुई। वे बचपन से पढ़ाई के साथ-साथ उन्हें भाषण देने में भी मजा आता था। उससे वे शुरू से ही भाषण कला में प्रवीण हो गए। यह प्रभाव उनके आज के भाषणों में बहुत दिखता है। अपने भाषणों से वे हर वर्ग को आकर्षित कर लेते हैं। उनके भाषणों से पता चलता है कि वे हर विषय के विद्वान हैं। हालांकि इसके पीछे उनकी मेहनत और तैयारी होती है। बहुत सारे विषयों पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अच्छा ज्ञान रखते हैं। वे अपने आलोचना को भी सकारात्मकता के साथ लेते रहे हैं। उन्होंने अपने भाषणों में कहा कि आलोचना से उन्हें और ज्यादा अच्छा करने की प्रेरणा मिलती है।
किस्सा नंबर 10 : शरारती नरेन्द्र शहनाई वादकों को इमली दिखाकर करते थे परेशान
जो बचपन शरारत के भरा न हो, वह बचपन ही क्या। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी बचपन में काफी शरारतें करते थे। एक शरारती किस्से का जिक्र उन्होंने मन की बात कार्यक्रम में भी किया था। उन्होंने बताया था कि वे शहनाई बजाने वालों को इमली दिखा दिया करते थे, ताकि उनके मुंह में पानी आ जाए और वे शहनाई ना बजा पाएं। शहनाई-वादक गुस्सा होकर नरेन्द्र के पीछे भी भागते थे। उनका मानना है कि शरारतों से भी बच्चों का विकास होता है और इससे बालमन काफी-कुछ सीखता है। इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा था कि शरारत के साथ बच्चों को पढ़ाई पर भी ध्यान देना चाहिए।
किस्सा नंबर 11 : नाटक मंचन से स्कूल की चारदीवारी के लिए पैसों का किया इंतजाम
पीएम और सीएम के रूप में नरेन्द्र मोदी ने हजारों स्कूल बनवाए हैं, ताकि देश के कर्णधार बेहतर शिक्षा हासिल कर खुद का और देश का नाम रोशन कर सकें। लेकिन मोदी ने बचपन में एक स्कूल की चारदीवारी बनवाकर सबकी खूब आशीष पाईं। हुआ यूं कि हाईस्कूल की पढ़ाई के दौरान नरेन्द्र मोदी के स्कूल का रजत जयंती वर्ष था। लेकिन उनके स्कूल में चारदीवारी तक नहीं थी। विद्यालय समिति के पास इतना पैसा भी नहीं था कि चारदीवारी बनवाई जा सके। तब किशोर नरेन्द्र के मन में विचार आया कि छात्रों को मिलकर इसमें मदद करनी चाहिए। अभिनय में माहिर नरेन्द्र ने अपने साथियों के साथ एक नाटक का मंचन किया और इससे जो पैसे आए, स्कूल को दे दिए ताकि स्कूल की चारदीवारी बन सके।
किस्सा नंबर 12 : खंभे पर चढ़कर फंसे पक्षी को बचाया, पशु-पक्षियों से है अगाध प्रेम
मां के कहने पर मगरमच्छ के बच्चे के वापस पानी में छोड़ने का जिक्र ऊपर आया है। दरअसल, नरेन्द्र के मन में बालपन से ही पशु-पक्षियों के प्रति अगाध प्रेम रहा है। ‘कॉमनमैन नरेंद्र मोदी’ में किशोर मकवाना ने एक किस्सा लिखा है- स्कूली दिनों में नरेंद्र एक एनसीसी कैंप में गए जहां से बाहर निकलना मना था। गोवर्धनभाई पटेल नाम के एक शिक्षक ने देखा कि मोदी एक खंभे पर चढ़े हुए हैं तो उन्हें बहुत गुस्सा आया, लेकिन अगले ही पल उन्होंने देखा कि नरेन्द्र खंभे पर चढ़कर एक फंसे हुए पक्षी को निकालने का प्रयास कर रहे हैं। उन्होंने नरेन्द्र के इस प्रयास की भूरि-भूरि प्रशंसा की। जीवों से प्रेम उन्हें आज तक है। पीएम बनने के बाद मोर को अपने हाथ से दाना खिलाने के फोटो भी खूब वायरल हुआ था।
किस्सा नंबर 13 : मामा के दिलाए जूतों पर चॉक के पाउडर से चकाचक पालिश
हम पहले ही बता चुके हैं बालक नरेन्द्र के घर की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। उस समय परिवार के लिए संभव नहीं था कि वे नए जूते खरीद कर पहन सकें। एक बार उनके मामा ने उन्हें सफेद कैनवस जूते खरीद कर दिए। रंग सफेद था तो जूते गंदे होने का डर था और नरेन्द्र मोदी के पास पॉलिश के लिए भी पैसे नहीं होते थे। ऐसे में उन्होंने एक तरीका निकाला। शिक्षक चॉक के जो टुकड़े फेंक देते थे, नरेन्द्र उन्हें जमा कर लेते थे और फिर उनका पाउडर बना लेते थे। इस पाउडर को भिगोकर अपने जूतों पर लगा लिया करते थे। सूखने पर जूते चकाचक दिखते थे।
किस्सा नंबर 14 : राजनीति का टर्निंग पॉइंट बनी इमरजेंसी, फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा
संघ से नरेन्द्र मोदी किशोरावस्था में ही जुड़ गए थे। बाद में भाजपा में एंट्री के बाद मोदी ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। कहा जाता है कि मोदी ने ही संगठन मंत्री के पद के साथ राजनीति को मिलाना शुरू किया। जन संघ के प्रमुख दीनदयाल उपाध्याय ने 1950 में संगठन मंत्री का पद बनाया था। तब से ही यह पद भाजपा संगठन की रीढ़ रहा है। 1975 की इमरजेंसी मोदी के राजनीतिक करियर का टर्निंग पॉइंट साबित हुई। इसी दौरान वे लालकृष्ण आडवाणी के संपर्क में आए और उनके करीबी बने। इस दौरान खिंचवाई मोदी की एक तस्वीर काफी चर्चित है। तस्वीर में वो पगड़ीधारी सिख के रूप में दिख रहे हैं। मोदी को 1990 में लालकृष्ण आडवाणी की चर्चित रथयात्रा का गुजरात वाला हिस्सा आयोजित कराने की जिम्मेदारी मिली थी। गुजरात में रथयात्रा के हर महत्वपूर्ण पड़ाव के दौरान मोदी की तस्वीर लालकृष्ण आडवाणी के साथ दिखाई दी।
किस्सा नंबर 15 : सीएम बनने से पहले ही धीरूभाई अंबानी ने कर दी पीएम बनने की भविष्यवाणी
आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि रिलायंस के फाउंडर धीरुभाई अंबानी ने नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने की भविष्यवाणी बहुत पहले ही कर दी थी। तब वो गुजरात के सीएम तक नहीं बने थे। इस बारे में उनके उद्योपति बेटे अनिल अंबानी ने यह किस्सा शेयर करते हुए लिखा था, “मैं 1990 के दशक में पहली बार नरेन्द्र मोदी से मिला। मेरे पिता धीरूभाई अंबानी ने तब उन्हें घर पर खाने के लिए बुलाया था। बातचीत के बाद पापा ने गुजराती में कहा- लंबी रेस ने घोड़ो छे, लीडर छे, पीएम बनसे। उनका मतलब था- ये लंबी रेस का घोड़ा है, सही मायने में लीडर है और ये प्रधानमंत्री बनेगा। दूरदर्शी धीरूभाई अंबानी ने उनकी आंखों में सपने देख लिए थे। वो वैसे ही थे जैसे अर्जुन को अपना विजन पता होता था।किस्सा नंबर 16 : बिग बी फिल्म ‘पा’ में टैक्स में छूट से लेकर ‘कुछ दिन तो गुजारो गुजरात में’ तक
नरेन्द्र मोदी के 66वें जन्मदिन पर बॉलीवुड के महानायक अमिताभ बच्चन ने एक किस्सा शेयर किया था। बिग बी के शब्दों में “मुख्यमंत्री निवास में आपसे पहली बार मुलाकात हुई थी। वो साधारण-सा एक घर था और उससे भी बहुत साधारण-सा कमरा था। मैं अपनी फिल्म ‘पा’ के लिए टैक्स में छूट की मांग के लिए आपसे मिलने गया था। तब आपने कहा कि साथ में फिल्म देखते हैं। आप अपनी ही गाड़ी में थिएटर ले गए। मेरे साथ फिल्म देखी और साथ में खाना खाया। इस बीच आपसे गुजरात टूरिज्म की ब्रांडिंग को लेकर भी बातचीत हुई।” बाद में अमिताभ गुजरात टूरिज्म के ब्रांड एंबेसडर भी बने। उनका ‘कुछ दिन तो गुजारो गुजरात में’ संवाद काफी लोकप्रिय हुआ।
किस्सा नंबर 17: वोकल फॉर लोकल से भारतीय टॉफी को ग्लोबल बना दिया
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यह किस्सा सबसे ताजा है। पीएम मोदी ने इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी को स्वदेशी ब्रांड पार्ले की ‘मेलोडी’ टॉफी उपहार में दिए जाने का वीडियो सोशल मीडिया पर बेहद चर्चित रहा। प्रधानमंत्री मोदी का यह अनूठा कदम उनके ‘वोकल फॉर लोकल’ (Vocal for Local) के विजन को एक वैश्विक मंच प्रदान करता है, जहां एक सामान्य भारतीय टॉफी ने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में भारत की स्थानीय पहचान और सांस्कृतिक मिठास को खूबसूरती से पेश किया। इस सहज और अनौपचारिक सौगात ने न केवल इंटरनेट पर ‘#Melodi’ ट्रेंड को नई ऊर्जा दी, बल्कि यह भी साबित कर दिया कि कैसे हमारे स्थानीय उत्पाद अपनी उच्च गुणवत्ता और लोकप्रियता के दम पर वैश्विक स्तर पर भारत की एक अनूठी और सौम्य छाप छोड़ सकते हैं



