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भारतीय जनसंघ की जिस कलकत्ता में नीव पड़ी उस बंगाल में भगवा लहराने का सफर 75 साल में तय हुआ

संवाददाता

कोलकाता। उत्तर कोलकाता की संकरी गलियों और पुराने मकानों के बीच स्थित 26 नंबर विधानसरिणी एक साधारण सा पता जरूर लगता है, लेकिन यह वही जगह है, जहां करीब 75 साल पहले भारतीय राजनीति का एक ऐसा विचार जन्मा, जिसने आगे चलकर देश की दिशा और दशा दोनों को प्रभावित किया। स्वामी विवेकानंद के पैतृक आवास से कुछ ही दूरी पर स्थित यह भवन आज प्रज्ञा मंदिर के नाम से जाना जाता है।

यह अपने में इतिहास की कई परतों को समेटे हुए है। बाहर से देखने पर यह इमारत बिल्कुल सामान्य लगती है, पर जैसे ही कोई इसके छोटे से गेट से अंदर प्रवेश करता है और लकड़ी की पुरानी, घुमावदार सीढ़ियों से ऊपर चढ़ता है, एक अलग ही दुनिया सामने खुलती है। दीवारों पर देशभक्ति और विचारधारा से जुड़े चित्र, ऊपर की मंजिल पर पुस्तकालय और शांत वातावरण, यह सब उस दौर की याद दिलाते हैं, जब यहां बैठकर बड़े फैसले लिए जाते थे।

एक मुलाकात, जिसने बदली दिशा

इतिहास के पन्नों को याद करते हुए बिप्वल राय, आरएसएस के प्रांत प्रचार प्रमुख, बताते हैं, 1950 में श्यामा प्रसाद मुखर्जी पहली बार यहां आए और एमएस गोलवलकर से मुलाकात की। नेहरू सरकार से मतभेद, खासकर कश्मीर में अनुच्छेद 370 के मुद्दे पर इस्तीफा देने के बाद मुखर्जी एक वैकल्पिक राजनीतिक मंच की तलाश में थे। इस मुलाकात के दौरान गोलवलकर ने दीनदयाल उपाध्याय और अटल बिहारी वाजपेयी को उनके साथ जोड़ा। यहीं, इसी भवन के एक कमरे में एक विचार ने संगठन का रूप लिया और 1951 में भारतीय जनसंघ की नींव रखी गई, जिसका चुनाव चिह्न दीपक तय किया गया।

विचार से संगठन, संगठन से आंदोलन

1940 में माधव स्मृति के रूप में स्थापित यह स्थान पूर्व भारत में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की गतिविधियों का प्रमुख केंद्र रहा। यहां से 40 से अधिक सामाजिक और राष्ट्रीय प्रकल्पों को मूर्त रूप दिया गया। नोआखाली दंगों के दौरान पीड़ितों को यहीं आश्रय मिला। यही वह जगह है, जहां बैठकर अटल बिहारी वाजपेयी ने राजनीति की दिशा तय करने वाली रणनीतियां तैयार कीं और दीनदयाल उपाध्याय ने एकात्म मानववाद का दर्शन प्रस्तुत किया। दूसरी मंजिल पर स्थित पुस्तकालय आज भी उसी रूप में मौजूद है।

जनसंघ से भाजपा तक

1952 के पहले आम चुनाव में जनसंघ ने तीन सीटें जीतकर अपनी मौजूदगी दर्ज कराई। इसके बाद पार्टी ने धीरे-धीरे अपने आधार को मजबूत किया और बलराज मधोक, दीनदयाल उपाध्याय, अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी जैसे नेताओं के नेतृत्व में विस्तार किया।

1975 में आपातकाल और उसके बाद 1977 में जनता पार्टी का गठन भारतीय राजनीति का अहम मोड़ बना। हालांकि 1980 में मतभेदों के चलते जनता पार्टी टूट गई और उसी से भारतीय जनता पार्टी का जन्म हुआ, जिसका चुनाव चिह्न कमल बना। दीपक से कमल तक का यह 75 साल का सफर केवल एक राजनीतिक दल का विकास नहीं, बल्कि एक विचारधारा के विस्तार की कहानी है, जिसकी शुरुआत 26 नंबर विधानसरिणी से हुई थी।

अब नहीं सुनना पड़ेगा ताना

भाजपा समर्थक रंजना कहती हैं कि पार्टी पिछले कई दशकों से बंगाल में सत्ता हासिल करने का प्रयास कर रही थी। उनके अनुसार, दुनिया के सबसे बड़े कार्यकर्ता आधार वाली इस पार्टी के लिए यह एक लंबे समय से देखा गया सपना था कि जिस बंगाल में जनसंघ की नींव पड़ी, वहां वह कभी सरकार नहीं बना सकी। रंजना कहती हैं कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह के नेतृत्व में वह सपना अब साकार हो गया है। अब उन आलोचनाओं का भी जवाब मिल गया है, जिनमें कहा जाता था कि श्यामा प्रसाद मुखर्जी के बंगाल से जुड़े होने के बावजूद पार्टी राज्य में कभी सत्ता तक नहीं पहुंच सकी। वे कहती हैं कि अब स्थिति बदल चुकी है और पार्टी कार्यकर्ताओं को वह पुराना ताना नहीं सुनना पड़ेगा, जिसमें कहा जाता था, विचार तो बड़ा है, लेकिन बंगाल में सरकार कभी नहीं बन पाई।

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