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बंगाल में 29 अप्रैल को ‘महामुकाबला’, 142 सीट पर संदेशखाली से बॉर्डर तक ममता के गढ़ BJP की अग्नि परीक्षा

संवाददाता

नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 अब अपने सबसे अहम मोड़ पर पहुंच चुका है। पहले चरण की 152 सीटों पर रिकॉर्ड वोटिंग के बाद अब नजरें 29 अप्रैल पर टिक गई हैं, जब राज्य की 142 सीटों पर मतदान होना है। यही वह दौर है जिसे राजनीतिक तौर पर बंगाल चुनाव का असली और निर्णायक चरण माना जा रहा है। वजह साफ है। यह सिर्फ वोटिंग का दूसरा फेज नहीं, बल्कि ममता बनर्जी की राजनीतिक पकड़ और भाजपा की पांच साल की रणनीति की सीधी परीक्षा है।

यह वह इलाका है जिसे मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का ‘पावर हाउस’ कहा जाता है, लेकिन पिछले पांच सालों में भारतीय जनता पार्टी(BJP) ने इसे अपनी सबसे बड़ी ‘सियासी प्रयोगशाला’ बना दिया है। संदेशखाली की गलियों से लेकर बांग्लादेश की सरहद से सटे गांवों तक, इस बार लड़ाई सिर्फ सत्ता की नहीं, बल्कि साख और अस्तित्व की है। जो इस फेज को जीतेगा, कोलकाता के ‘राइटर्स बिल्डिंग’ की चाबी उसी के पास होगी।

29 अप्रैल को जिन 142 सीटों पर मतदान होना है, उन्हें बंगाल की सत्ता का ‘हार्ट जोन’ कहा जाता है। यह वही इलाका है जहां से ममता बनर्जी ने लगातार अपनी राजनीतिक ताकत बनाई और 2021 में भारी जीत हासिल की थी। इस बार भी तस्वीर लगभग वैसी ही है, लेकिन राजनीतिक समीकरण पहले से कहीं ज्यादा जटिल हो चुके हैं। इन सीटों पर मुकाबला सिर्फ दलों के बीच नहीं है, बल्कि दो अलग-अलग राजनीतिक नैरेटिव के बीच है। एक तरफ TMC अपने विकास, महिला वोट बैंक और क्षेत्रीय पहचान की राजनीति के सहारे मैदान में है। दूसरी तरफ भाजपा राष्ट्रवाद, सीमा सुरक्षा, नागरिकता और हिंदू वोटों के ध्रुवीकरण के जरिए अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रही है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर भाजपा इस चरण में बेहतर प्रदर्शन करती है, तो वह बंगाल की सत्ता के समीकरण बदल सकती है। वहीं अगर TMC अपना दबदबा बनाए रखती है, तो ममता बनर्जी की वापसी का रास्ता और आसान हो सकता है।

दूसरे और अंतिम बड़े चरण में 8 जिलों की 142 सीटों पर वोटिंग होगी। इन जिलों में कोलकाता की सभी शहरी सीटें शामिल हैं। इसके अलावा उत्तर 24 परगना, दक्षिण 24 परगना, हावड़ा, नदिया, पूर्व मेदिनीपुर, पश्चिम मेदिनीपुर, पूर्व बर्धमान और पश्चिम बर्धमान जैसे इलाके भी इसी चरण का हिस्सा हैं। यह सिर्फ भौगोलिक रूप से बड़ा क्षेत्र नहीं है, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक रूप से भी बेहद विविध इलाका है। कहीं मुस्लिम आबादी निर्णायक भूमिका में है, तो कहीं अनुसूचित जाति और मतुआ समुदाय चुनावी दिशा तय करते हैं। कई सीटें औद्योगिक बेल्ट में आती हैं, जहां रोजगार और आर्थिक मुद्दे महत्वपूर्ण हैं। 142 सीटों पर कुल 1448 उम्मीदवार चुनाव मैदान में हैं। TMC ने सभी सीटों पर उम्मीदवार उतारे हैं। भाजपा लगभग सभी सीटों पर चुनाव लड़ रही है। कांग्रेस भी पूरी ताकत के साथ मैदान में है, जबकि वाम दलों की मौजूदगी कुछ चुनिंदा क्षेत्रों में प्रभाव डाल सकती है।

दूसरे चरण में जिन 142 सीटों पर मतदान होना है, वह दक्षिण बंगाल का वह ‘कोर बेल्ट’ है जहाँ 2021 में तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने एकतरफा क्लीन स्वीप किया था। पहले चरण में उत्तरी बंगाल और जंगलमहल में बीजेपी का पलड़ा भारी माना जा रहा था, लेकिन असली इम्तिहान अब शुरू हुआ है। इस फेज में कोलकाता की सभी शहरी सीटें, उत्तर और दक्षिण 24 परगना, हावड़ा, नदिया, पूर्व और पश्चिम मेदिनीपुर के साथ-साथ बर्धमान का इलाका शामिल है। 2021 के आंकड़े बताते हैं कि इन 142 सीटों में से टीएमसी ने 123 सीटों पर कब्जा किया था, जबकि बीजेपी महज 18 सीटों पर सिमट गई थी। कोलकाता और 24 परगना जैसे जिलों में तो बीजेपी का खाता तक नहीं खुला था। ममता बनर्जी की सत्ता की हैट्रिक इसी इलाके की बदौलत संभव हुई थी, जिसे अब भेदने के लिए बीजेपी ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है।

भाजपा ने 2021 के बाद बंगाल में अपनी रणनीति पूरी तरह बदली। पार्टी ने यह समझ लिया कि सिर्फ उत्तरी बंगाल और जंगलमहल में मजबूत प्रदर्शन काफी नहीं होगा। सत्ता तक पहुंचने के लिए दक्षिण बंगाल में सेंध लगाना जरूरी है। इसी वजह से पिछले पांच साल में भाजपा ने सीमा क्षेत्र, हिंदू वोट बैंक, नागरिकता संशोधन कानून (CAA), घुसपैठ और कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दों पर लगातार अभियान चलाया। भाजपा नेताओं ने सीमावर्ती जिलों में लगातार सभाएं कीं और स्थानीय मुद्दों को राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनाया। राजनीतिक रूप से यह इलाका भाजपा की ‘प्रयोगशाला’ इसलिए माना जा रहा है क्योंकि पार्टी ने यहां लंबे समय तक संगठन विस्तार, बूथ नेटवर्क और धार्मिक ध्रुवीकरण की रणनीति पर काम किया। अब चुनाव में यह तय होगा कि पांच साल की मेहनत वोटों में बदलती है या नहीं।

इस चुनावी चरण का सबसे बड़ा राजनीतिक पहलू सीमा से जुड़े इलाके हैं। उत्तर 24 परगना और नदिया जिले की कई सीटें सीधे बांग्लादेश सीमा से जुड़ी हुई हैं। बोंगांव, बगदा, स्वरूपनगर, बशीरहाट, करीमपुर, तेहट्टा, चापड़ा और कृष्णगंज जैसे क्षेत्र राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील माने जाते हैं। इन्हीं इलाकों में घुसपैठ, सीमा सुरक्षा और नागरिकता के मुद्दे चुनावी बहस में बार-बार सामने आते हैं। भाजपा लंबे समय से दावा करती रही है कि सीमा पार से अवैध घुसपैठ बंगाल की राजनीति और जनसंख्या संतुलन को प्रभावित कर रही है। दूसरी तरफ TMC इस मुद्दे को राजनीतिक ध्रुवीकरण का प्रयास बताती रही है। पार्टी का कहना है कि भाजपा चुनावी लाभ के लिए सामाजिक विभाजन पैदा करने की कोशिश करती है। संदेशखाली का नाम भी पिछले कुछ समय में राष्ट्रीय राजनीति में चर्चा का हिस्सा बना। भाजपा ने इस मुद्दे को महिला सुरक्षा और स्थानीय प्रशासन के सवाल से जोड़कर चुनावी अभियान में इस्तेमाल किया।

पश्चिम बंगाल के पहले फेज की 152 सीटों पर हुई रिकॉर्ड 93% वोटिंग ने सियासी पंडितों को हैरान कर दिया है। अगर यही ट्रेंड 29 अप्रैल को भी रहा, तो यह बंगाल के चुनावी इतिहास का सबसे बड़ा टर्नआउट होगा। सवाल यह है कि इतनी भारी वोटिंग का फायदा किसे मिलेगा? आमतौर पर भारी वोटिंग को ‘एंटी-इंकंबेंसी’ यानी सरकार के खिलाफ गुस्से के तौर पर देखा जाता है। लोग जब मौजूदा व्यवस्था से नाराज होते हैं, तो उसे बदलने के लिए बड़ी संख्या में घर से निकलते हैं। लेकिन बंगाल का डेटा कुछ और ही कहानी कहता है। आजादी के बाद से यहाँ 17 बार विधानसभा चुनाव हुए हैं और सिर्फ 4 बार सत्ता बदली है। इनमें से 3 बार ऐसा हुआ जब वोटिंग प्रतिशत में 4.5% से ज्यादा का उछाल आया और सत्ता पलट गई। 2011 में जब ममता ने लेफ्ट का 34 साल पुराना किला ढहाया था, तब वोटिंग में 2.4% की बढ़ोतरी हुई थी।

आजादी के बाद पश्चिम बंगाल में कुल 17 विधानसभा चुनाव हुए हैं। इनमें सिर्फ 4 बार सत्ता परिवर्तन हुआ। दिलचस्प बात यह है कि कई चुनावों में वोटिंग प्रतिशत में बड़ा बदलाव देखने को मिला, लेकिन सत्ता वही रही। 2011 में जब ममता बनर्जी ने लेफ्ट फ्रंट के 34 साल पुराने शासन को खत्म किया, तब वोटिंग में बढ़ोतरी जरूर हुई थी। लेकिन कई चुनाव ऐसे भी रहे, जहां हाई टर्नआउट के बावजूद सरकार दोबारा सत्ता में लौट आई।

रिकॉर्ड वोटिंग के पीछे कई तर्क दिए जा रहे हैं। एक चर्चा SIR (स्वैच्छिक पहचान पंजीकरण) को लेकर भी है। कुछ जानकारों का मानना है कि वोटर्स को डर है कि अगर उन्होंने वोट नहीं दिया तो नागरिकता की सूची या सरकारी रिकॉर्ड से उनका नाम कट सकता है। वहीं दूसरा पक्ष कहता है कि यह वोटिंग सरकारी नीतियों के विरोध या समर्थन का एक सशक्त माध्यम है। एक लॉजिक यह भी है कि इस बार कुल वोटर्स की लिस्ट में सुधार हुआ है, जिससे संख्या कम हुई लेकिन सक्रिय वोटर्स उतने ही रहे, जिसके कारण प्रतिशत बढ़ा हुआ दिख रहा है। हालांकि, हाई टर्नआउट कई बार ‘प्रो-इंकंबेंसी’ का भी संकेत होता है, जहां लोग अपने चहेते नेता (चाहे वो मोदी हों या ममता) को और मजबूत करने के लिए भारी मतदान करते हैं। जैसा हमने हाल ही में बिहार के पिछले चुनावों में देखा था।

SIR फैक्टर क्या है और क्यों हो रही चर्चा? बंगाल में इस बार वोटिंग बढ़ने के पीछे कई राजनीतिक कारण बताए जा रहे हैं। इनमें एक चर्चा SIR यानी मतदाता सूची से जुड़े संशोधन और पहचान सत्यापन प्रक्रिया को लेकर भी हो रही है। कुछ लोगों का मानना है कि मतदाता सूची में नाम कटने की आशंका के कारण लोग ज्यादा संख्या में वोट डालने पहुंचे। वहीं दूसरी राय यह है कि वोटर्स ने विरोध जताने के लिए अधिक मतदान किया। एक तकनीकी तर्क यह भी दिया जा रहा है कि अगर कुल वोटरों की संख्या कम हो और वोट डालने वालों की संख्या लगभग समान रहे, तो प्रतिशत बढ़ा हुआ दिखाई दे सकता है।

क्या इतिहास खुद को दोहराएगा? बंगाल की सत्ता का रास्ता दक्षिण बंगाल की इन्ही गलियों से होकर गुजरता है। अगर ममता बनर्जी अपनी 123 सीटों के स्कोर को बचाने में कामयाब रहती हैं, तो उनकी सत्ता पर कोई खतरा नहीं होगा। लेकिन अगर बीजेपी ने इस ‘कोर बेल्ट’ में 40-50 सीटों का भी डेंट लगा दिया, तो बंगाल के राजनीतिक समीकरण पूरी तरह बदल जाएंगे। 29 अप्रैल का यह फाइनल राउंड सिर्फ एक चुनाव नहीं है, बल्कि यह फैसला करेगा कि बंगाल की राजनीति ‘अस्मिता और योजनाओं’ पर चलेगी या ‘परिवर्तन और ध्रुवीकरण’ पर। संदेशखाली की टीस और बांग्लादेश बॉर्डर की हलचल के बीच, बंगाल का वोटर खामोश है, लेकिन उसके हाथ में मौजूद ‘ईवीएम का बटन’ 4 मई को एक बड़ी गूँज पैदा करने वाला है।।

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