
शुभम आर्य

25 जून को मिलान में आयोजित अपने स्प्रिंग/समर 2026 पुरुष परिधानों के फैशन शो के दौरान, इटली के लक्ज़री फैशन ब्रांड प्राडा ने भारत के भौगोलिक संकेतक (GI) टैग प्राप्त कोल्हापुरी चप्पलों से प्रेरित एक जूते की श्रृंखला पेश की, जिससे सांस्कृतिक अनुचित अपनाने (Cultural Appropriation) को लेकर भारी विरोध हुआ। ब्रांड पर पारंपरिक भारतीय शिल्पकला को बिना किसी मान्यता या श्रेय दिए अपनाने का आरोप लगाया गया। यह एक बड़ा नैतिक और कानूनी विवाद बन गया है – एक ओर वैश्विक रूप से प्रसिद्ध फैशन हाउस प्राडा है, और दूसरी ओर भारत की सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ी पारंपरिक हस्तनिर्मित चमड़े की कोल्हापुरी चप्पलें।
पारंपरिक कोल्हापुरी चप्पल निर्माता प्राडा के खिलाफ मुकदमा दायर करने की तैयारी कर रहे हैं, यह दावा करते हुए कि ब्रांड ने उनकी अनूठी डिजाइन को बिना अनुमति और बिना श्रेय दिए अपनी नई जूता श्रृंखला में शामिल कर लिया। यह प्रकरण न केवल बौद्धिक संपदा अधिकारों और सांस्कृतिक अनुचित अपनाने को लेकर गंभीर प्रश्न उठाता है, बल्कि यह भारत के GI संरक्षण तंत्र के उल्लंघन का भी मामला है।
कोल्हापुरी चप्पलें अपनी बारीक हाथ से की गई सिलाई और वनस्पति रंगे हुए चमड़े के लिए प्रसिद्ध हैं, और यह खासतौर पर महाराष्ट्र और कर्नाटक के तीन ज़िलों – कोल्हापुर, सांगली और बेलगावी – में बनाई जाती हैं। ‘भौगोलिक संकेतक वस्तुओं का पंजीकरण और संरक्षण अधिनियम, 1999’ के तहत इन्हें 2019 में GI टैग प्रदान किया गया था। यह टैग ऐसे उत्पादों को कानूनी सुरक्षा देता है जिनकी गुणवत्ता, ख्याति या अन्य विशेषताएँ उनके भौगोलिक मूल से जुड़ी होती हैं। साथ ही, यह उनके सांस्कृतिक और क्षेत्रीय विशिष्टता को वैधता भी प्रदान करता है।
प्राडा द्वारा लॉन्च किए गए खुले पैर के चमड़े के सैंडल, अपनी बनावट, तलवों और पैर के अंगूठे की गाँठ के डिज़ाइन में पारंपरिक कोल्हापुरी चप्पलों से मिलते-जुलते हैं, जिसने यह विवाद खड़ा कर दिया। भारतीय कारीगरों और सहकारी संस्थाओं का कहना है कि प्राडा ने यह डिज़ाइन अपनाकर कोल्हापुरी चप्पलों के GI संरक्षण का उल्लंघन किया है। उनके अनुसार यह केवल एक सौंदर्य प्रेरणा नहीं, बल्कि वाणिज्यिक और सांस्कृतिक शोषण है – जब गरीब कारीगरों की मेहनत का उपयोग वैश्विक लाभ के लिए होता है, लेकिन न उन्हें श्रेय मिलता है, न लाभ।
कानूनी दृष्टि से यह दावा GI अधिनियम की धारा 21 के तहत मजबूत है, जो यह स्पष्ट करती है कि कोई भी व्यक्ति किसी पंजीकृत GI का ऐसा उपयोग नहीं कर सकता जिससे उपभोक्ता भ्रमित हों या जिससे अनुचित प्रतिस्पर्धा हो। इसके अतिरिक्त, धारा 22 में GI उल्लंघन के अन्य प्रकारों का भी उल्लेख है, जैसे गलत दावे, मूल स्थान की झूठी प्रस्तुति, और GI की प्रतिष्ठा को हानि पहुँचाना। साथ ही, चूंकि भारत और इटली दोनों WTO के TRIPS समझौते के हस्ताक्षरकर्ता हैं, इसलिए GI का अंतरराष्ट्रीय प्रवर्तन भी संभव है, जिससे भारतीय कारीगरों को सीमा पार कानूनी सहारा मिलने का रास्ता खुलता है।
GI टैगिंग के ज़रिए भारत लंबे समय से अपनी पारंपरिक कला और सांस्कृतिक विरासत की रक्षा कर रहा है। मैसूर सिल्क, बनारसी साड़ी, और दार्जिलिंग चाय जैसे उत्पादों को GI टैग देना इस दिशा में भारत की प्रतिबद्धता को दर्शाता है। कोल्हापुरी चप्पल का मामला इस राष्ट्रीय पहल का प्रतीक बन गया है, जो इस बात को रेखांकित करता है कि हमें मजबूत अंतरराष्ट्रीय तंत्र की ज़रूरत है जो सीमा-पार GI उल्लंघनों से प्रभावी तरीके से निपट सके।
यह मुद्दा एक व्यापक नैतिक बहस को भी जन्म देता है — कि संस्कृति की सराहना (appreciation) और संस्कृति की अनुचित नकल (appropriation) के बीच सीमा रेखा क्या है। वैश्विक फैशन अक्सर विभिन्न संस्कृतियों से प्रेरणा लेता है, लेकिन जब पारंपरिक कारीगरों को न श्रेय मिलता है, न मुनाफे में हिस्सेदारी – तो यह एकतरफा शोषण का रूप ले लेता है। इसीलिए, केवल कानूनी अनुपालन ही नहीं, बल्कि पारदर्शिता, निष्पक्ष व्यापार, और कारीगर समुदायों के साथ वास्तविक साझेदारी जैसे नैतिक पहलुओं को अपनाना भी ब्रांडों की जिम्मेदारी बनती है।
अंततः, कोल्हापुरी चप्पल निर्माताओं द्वारा विचाराधीन कानूनी कार्यवाही केवल डिज़ाइन स्वामित्व की लड़ाई नहीं है – यह एक घोषणा है कि पारंपरिक ज्ञान प्रणाली, बौद्धिक संप्रभुता, और सांस्कृतिक विरासत की रक्षा की जानी चाहिए। भारत GI कानूनों को सख्ती से लागू कर और वैश्विक कानूनी ढाँचों से समर्थन लेकर इस दिशा में एक मिसाल कायम कर सकता है। जब वैश्वीकरण और परंपरा एक-दूसरे से टकराते हैं, तब यह ज़रूरी है कि इतिहास केवल संरक्षित ही न हो, बल्कि नैतिक रूप से साझा भी किया जाए।
( लेखक – शुभम आर्य राजीव गांधी राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय, पंजाब के शाेध छात्र हैं )



