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बिहार में इस बार भी लालू-राबड़ी राज की अराजकता पर ही खेलेंगा नीतीश और एनडीए

विशेष संवाददाता

पटना। बिहार विधानसभा चुनाव में एनडीए ने अपने मुद्दे का संकेत दे दिया है. सीएम नीतीश कुमार से लेकर पीएम नरेंद्र मोदी तक की जुबान से जिस तरह 2005 के पहले की बातों का जिक्र होता रहा है, उससे साफ है कि एनडीए के पास नया कोई मुद्दा विपक्षी महागठबंधन को सत्ता में आने से रोकने के लिए नहीं है. मंगलवार को विधानसभा में राज्यपाल के अभिभाषण पर नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव और सीएम नीतीश कुमार के बीच जो झकझूमर हुआ, उसमें फिर इसका प्रकटीकरण हुआ कि एनडीए 2005 के पहले की स्थिति को ही मुद्दा बनाएगा.

2005 के पहले कुछ था जी!

नीतीश कुमार का तकिया कलाम है- ‘2005 के पहले यहां कुछ था जी!’ यही भय और भाव दिखा कर वे नवंबर 2005 में सीएम बने थे. उसी भय को भुना कर वे बाद में भी सीएम बनते रहे. पीएम नरेंद्र मोदी इस बार बिहार आए तो 2005 के पहले के जंगल राज की ही चर्चा की. कहा गया कि पीएम मोदी ने इस साल अक्टूबर में होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए एजेंडा सेट कर दिया है. लोकसभा चुनाव में भी केंद्रीय नेताऔं से लेकर एनडीए के प्रदेश स्तर के नेताओं ने आरजेडी का यही भय दिखा कर वोट मांगा था. पीएम तो आरजेडी नेताओं को को जंगल राज वाले कह कर संबोधित करते रहे हैं. नीतीश 2005 के पहले की भायवह व त्रासद स्थिति बता कर तेजस्वी को अक्सर जलील करते हैं.

RJD ने अब खोज ली है काट

आरजेडी भी समझ गया है कि महागठबंधन को घेरने के लिए एनडीए के पास अब कुछ नहीं बचा है. एनडीए के इस मुद्दे की काट भी आरजेडी ने अब खोज लरी है. यह तेजस्वी यादव द्वारा सदन में राज्यपाल के अभिभाषण पर दिए वक्तव्य से जाहिर होता है. तेजस्वी के सलाहकारों ने उन्हें इस मुद्दे की तर्कसंगत काट खोज निकाली. सदन में भाषण के दौरान तेजस्वी ने यह स्थापित करने की कोशिश की कि नीतीश कुमार या एनडीए के दूसरे छोटे-बड़े नेताओं का यह आरोप निराधार या गलत है कि बिहार में 200 के पहले कुछ नहीं था. उन्होंने यूनिवर्सिटी, इंजीनियरिंग कालेज, समाज के दलितों-पिछड़ों के लिए किए गए काम गिनाए. यहां तक तेजस्वी ने कह दिया कि नीतीश कुमार जिस इंजीनियरिंग कालेज से पढ़े, वह तो 2005 के पहले ही बना था. नेता प्रतिपक्ष ने सदन में नीतीश कुमार को घेरने के लिए उनके इसी तकिया कलाम का सहारा लिया. तेजस्वी ने यह बताने की पूरी कोशिश की 2005 के पहले का भय दिखा कर वोट मांगने की कोशिश की काट आरजेडी ने अब खोज ली है.

आरजेडी ने बोला तीखा हमला

आरजेडी के रणनीतिकारों में शुमार राज्यसभा सदस्य मनोज झा भी बुधवार को दिल्ली में तेजस्वी के सुर से सुर मिलाते दिखे. उन्होंने नीतीश कुमार पर तीखा हमला किया और कहा तंज कसा कि नीतीश को सृष्टिकर्ता होने का वहम हो गया है. वे अपने को ब्रह्मा मानने लगे हैं. उन्हें लगता है कि 2005 के पहले दुनिया ही नहीं थी. मनोज झा का दिल्ली में मोर्चा खोलना यह बताता है कि राजद ने अब इस मुद्दे पर एनडीए नेताओं की सिट्टी-पिट्टी गुम करने की ठान चुका है. तेजस्वी यादव इस मुद्दे को सदा के लिए मिटा देना चाहते हैं. पीएम, सीमेंट एनडीए के तमाम नेता अभी तक इसी मुद्दे पर तेजस्वी को घेरते रहे हैं.

तेजस्वी का वर्तमान पर है जोर

अब यह बात साफ हो गई है कि एनडीए विधानसभा चुनाव में अगर 2005 के पहले की स्थिति को मुद्दा बनाएगा तो वे उसका जवाब तो देंगे ही, उनका फोकस 2025 की स्थिति पर होगा. उनके वक्तव्य में इसकी झलक भी मिली कि कैसे एक पुल बनने से पहले ही तीन-तीन बार टूट जाता है. एनडीए के शासन में अपराध और भ्रष्टाचार पर तो तेजस्वी का फोकस पहले से ही रहा है. वे बिहार में अपराधों का बुलेटिन भी जारी करते रहे हैं. भ्रष्टाचार के बारे में वे डीके टैक्स की बात करते हैं. वे यह भी कहते हैं कि बिहार में डीके कौन हैं और उनका असर सिस्टम पर कैसा है, समय आने तेजस्वी इसे भी उजागर करने की बात करते हैं. कुल मिला कर तेजस्वी चाहते हैं कि अतीत के बजाय 2025 की मौजूदा स्थिति पर चर्चा होनी चाहिए. वे यह भी बता गए कि अतीत की गौरवगाथा भी उनके पास अब आ गई है, जिसकी झलक उन्होंने सदन में दिखा भी दी.

सरकार खटारा, सिस्टम नाकारा

तेजस्वी यादव मौजूदा शासन का आकलन इस रूप में करते हैं- सरकार खटारा, सिस्टम नाकारा और सीएम थका-हारा. यह विधानसभा चुनाव में महागठबंधन का स्लोगन बन जाए तो आश्चर्य नहीं. पहले भी तेजस्वी इस तरह की बातें कहते रहे हैं. सीएम को लाचार, थका-हारा, अचेत जैसे कई संबोधनों से नवाज चुके हैं. खटारा सरकार की बत इसलिए भी समझ में आती है कि 243 सीटों वाली विधानसभा में तीसरे नंबर की पर्टी का नेता सीएम है. भाजपा और हिन्दुस्तानी अवाम मोर्चा (HAM) के सहारे सरकार चल रही है. सीएम की कुर्सी सलामत रखने के लिए नीतीश कुमार कभी महागठबंधन तो कभी एनडीए के बीच आवाजाही करते रहे हैं. नाकारा सिस्टम भी सबको पता है. जरूरत सिर्फ उसे उदाहरण के साथ सार्वजनिक करने की है, जो तेजस्वी पहले भी करते रहे हैं. वे टूटते-ढहते पुलों की याद दिला सकते हैं. वे डीके के बारे में भी रहस्योद्घाटन कर सिस्टम को प्रभावित करने में उनकी भूमिका को उजागर कर सकते हैं.

तो पहले जो दिखा, वो गलत था!

नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव की इस नोक-झोंक से यह सवाल उठता है कि इनमें कौन सही बोल रहा. नीतीश 2005 के पहले की स्थिति का जिक्र करते हैं तो क्या उसे तेजस्वी के तर्कों से खारिज किया जा सकता है. क्या यह सही नहीं है कि लगातार 15 साल के लालू-राबड़ी राज में अपराधी बेकाबू थे. अपहरण उद्योग बन गया था. शाम ढलते लोगों का घरों से निकलना मुश्किल था. रंगदार शो रूम से गाड़ियां उठा ले जाते थे. पटना हाईकोर्ट की बिहार में जंगल राज वाली टिप्पणी बेमानी थी. हाल ही में लालू यादव के साले सुभाष यादव ने सनसनीखेज खुलासा किया था कि तब उद्योग का स्वरूप ले चुके अपहरण के मामलों में फिरौती की रकम सीएम हाउस में तय होती थी. इससे भी बड़ा सवाल कि तब बिहार के अविकास, अपराधीकरण, भ्रष्टाचार और लचर प्रशासनिक व्यवस्था
जिन लोगों ने देखे हैं, वे क्या गलत थे !

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