
विशेष संवाददाता
लखनऊ। बसपा प्रमुख मायावती की गोद में खेलकर बड़े हुए और उंगली पकड़ कर सियासत में आए आकाश आनंद पार्टी में नंबर-2 की हैसियत रखते थे. आकाश आनंद को मायावती ने आठ साल तक अपनी छत्रछाया में रखकर राजनीति का ककहरा सिखाया और बसपा के तौर-तरीके से वाकिफ कराया. मायावती ने आकाश को अपना सियासी उत्तराधिकारी तक बना दिया था, लेकिन आकाश आनंद ने जैसे ही सियासी परवान भरना शुरू किया तो जमीन पर उतारने में एक भी मिनट देर नहीं लगाया.
मायावती ने आकाश आनंद को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया है. आकाश के ससुर अशोक सिद्धार्थ को पहले ही पार्टी से निकाल चुकी हैं. मायावती ने रविवार को आकाश आनंद को नेशनल कोऑर्डिनेटर सहित सारे पदों से मुक्त कर दिया था और दूसरे दिन पार्टी से बाहर कर दिया. बसपा में नंबर दो की पोजीशन पर बैठने वाले नेता की पहली बार कोई बलि नहीं चढ़ी, इससे पहले भी बसपा में जिस भी नेता ने उड़ने की कोशिश की, उसे फौरन पार्टी से बाहर कर दिया गया, बस फर्क यह है कि मायावती के कहर का शिकार पहली बार उनके परिवार का कोई सदस्य बना है.
मायावती ने जब किया था अपने उत्तराधिकारी का ऐलान
कांशीराम के द्वारा गठित की गई बसपा की सर्वेसर्वा मायावती हैं. मायावती के मर्जी के बगैर बसपा में एक परिंदा भी पर नहीं मार सकता. मायावती के बाद बसपा में दूसरे नंबर की कुर्सी पर कई नेताओं ने अपना हक जताया और खुद को मायावती के सियासी उत्तराधिकारी के तौर पर भी देखते रहे. ऐसे में खासकर तब जब एक समय मायावती ने 9 अगस्त 2008 को लखनऊ में एक रैली में अपने उत्तराधिकारी के संकेत दिए थे. किसी का नाम लिए बगैर मायावती ने कहा था कि उत्तराधिकारी को नामित किया है, जो उनसे 18-20 वर्ष छोटा है, उनके अपने ‘दलित’ समुदाय से है, लेकिन उनके परिवार से नहीं है.
मायावती ने दावा किया था कि उत्तराधिकारी का नाम लिखकर एक सीलबंद लिफाफे में बंद कर दिया गया है, जिसे उनके करीबी एक विश्वासपात्रों के पास सुरक्षित रखा गया है, जो उनकी मृत्यु या कारावास की स्थिति में नाम का खुलासा करेंगे. इसके बाद से ही बसपा में समय-समय पर मायावती के सियासी उत्तराधिकारी के नाम चर्चा में आए, लेकिन फाइनल मुहर आकाश आनंद के नाम पर लगी, जिसे मायावती ने पहले 2024 लोकसभा चुनाव के दौरान वापस लिया और फिर 46 दिन बाद बहाल कर दिया, लेकिन उन्हें बाहर निकालने के साथ ही साफ कर दिया कि अब वे जीते जी किसी को भी उत्तराधिकारी नहीं बनाएंगी.
बसपा के नंबर दो के पद पर होना आसान नहीं
आकाश आनंद और अशोक सिद्धार्थ से पहले कई नेता रहे हैं, जो बसपा में नंबर दो की हैसियत रखते थे. आजमगढ़ के रहने वाले राजा राम एक समय में बसपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और नेशनल कोऑर्डिनेटर के पद पर रहे, लेकिन मायावती के सियासी उत्तराधिकारी के तौर पर उनका नाम आने पर मायावती ने उन्हें बसपा से बाहर का रास्ता दिखा दिया था. 2007 से 2012 तक बसपा के सत्ता में रहते हुए जुगल किशोर की तूती बोला करती थी. बसपा में उनकी गिनती नंबर दो के नेता की हो रही थी, लेकिन मायावती ने उन्हें भी बाहर का रास्ता दिखाने में एक भी मिनट नहीं लगाया.
वीर सिंह और जय प्रकाश को भी एक समय बसपा में मायावती का सियासी उत्तराधिकारी माना जाने लगा था. दोनों दलित नेता बसपा के तमाम बड़े पदों पर रहे हैं. वीर सिंह नेशनल कोऑर्डिनेटर तो जय प्रकाश बसपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष के पद पर रहे, लेकिन पार्टी में जब वो खुद को मायावती के सियासी कद के बराबर के नेता मानने लगे, तो एक मिनट में ही मायावती ने उन्हें पैदल कर दिया. बुंदेलखंड से आने वाले गयादीन दिनकर और दद्दू प्रसाद एक समय बसपा के बड़े नेता हुआ करते थे, दोनों ही दलित समाज से थे. कांशीराम के साथ राजनीति में आए थे, जिसके चलते खुद को वो मायावती के बाद दूसरे नंबर के नेता मानते थे, लेकिन मायावती की नजर टेढ़ी होते ही बाहर हो गए.
नसीमुद्दीन सिद्दीकी से लेकर बाबू सिंह कुशवाहा और स्वामी प्रसाद मौर्या भी एक समय बसपा में दूसरी पंक्ति के नेता गिने जाते थे, लेकिन मायावती की नजर जब टेढ़ी हुई तो पार्टी छोड़ते देर नहीं की. इसी फेहरिस्त में आजमगढ़ के रहने वाले गांधी आजाद और बलिहारी बाबू का नाम भी आता था. बसपा में उनका दबदबा था, लेकिन जैसे ही सियासत में उड़ने की कोशिश की तो मायावती ने पार्टी से बाहर निकालने में एक भी मिनट नहीं लगाया. इंद्रजीत सरोज के साथ भी मायावती ने ऐसा ही सुलूक किया था, जबकि पासी समाज के बड़े नेता माने जाते थे. सतीश चंद्र मिश्रा भी बसपा में नंबर दो की पोजीशन रखते हैं, लेकिन फिलहाल साइड लाइन चल रहे हैं.
कांशीराम ने रखी बुनियाद तो मायावती ने दी बुलंदी
बसपा की बुनियाद भले ही कांशीराम ने रखी, लेकिन उसे सियासी बुलंदी तक ले जाने का काम मायावती ने किया. कांशीराम ने यूपी को दलित राजनीति की प्रयोगशाला बनाया था. कांशीराम ने दलित, पिछड़े और अति पिछड़ा वर्ग के तमाम नेताओं को साथ लेकर दलित समाज के बीच राजनीतिक चेतना जगाने के लिए बहुजन समाज पार्टी का गठन किया था. कांशीराम ने पहले दलित समाज के हक और हुकूक के लिए डीएस-4, फिर बामसेफ और 1984 में दलित,ओबीसी और अल्पसंख्यक समाज के वैचारिक नेताओं को जोड़कर बहुजन समाज पार्टी का गठन किया.
कांशीराम के संपर्क में मायावती आईं तो उत्तर प्रदेश में बीएसपी को एक नई ताकत मिली. साल 1993 में बसपा ने सपा के साथ मिलकर यूपी में सरकार बनाई. इसकेबाद एक के बाद एक कामयाबी की सीढ़ी मायावती भी चढ़ती गईं. साल 2007 में तो बसपा ने सूबे में ऐतिहासिक जीत का परचम फहराया, लेकिन इस सफर में कांशीराम के वो सभी साथी बसपा से दूर होते चले गए, जो कभी पार्टी की जान हुआ करते थे.
मायावती के कहर का कब और कौन हो जाए शिकार?
बसपा प्रमुख मायावती के सियासी कहर का शिकार कब, कौन, कहां और कैसे हो जाए कहा नहीं जा सकता. मायावती ने बसपा के उन नेताओं को भी नहीं बख्शा, जिन्होंने पार्टी संस्थापक कांशीराम के साथ कंधे से कंधा मिलाकर दलितों के बीच राजनीतिक चेतना जगाने और बसपा को मजबूत करने का काम किया. बसपा में जिस नेता पर मायवती की नजर टेढ़ी हुई, उसे बाहर जाना ही पड़ा है.
कांशीराम के साथ राजनीतिक पारी शुरू करने वाले तमाम नेता मायावती का सियासी कद बढ़ने के बाद पार्टी छोड़ गए या फिर मायावती ने खुद उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया. बसपा में किसी भी नेता को नहीं पता होता कि मायावती किस बात से नाराज हो जाती हैं और किस बात पर मान जाती हैं इसलिए बसपा में आए दिन नेताओं के छोड़ने या फिर पार्टी से बाहर निकाले जाने की खबरें आती रहती हैं. मायावती जब भी किसी नेता को बसपा से निकालती हैं तो एक बात लिखती हैं कि मूवमेंट के साथ कोई भी समझौता नहीं करेंगी.
मायावती के सामने कोई चुनौती खड़ी नहीं हो सकी
मायावती ने अपने चार दशक के सियासी सफर में बसपा के कार्यकर्ता से यूपी की मुख्यमंत्री और पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष तक का सफर तय किया है. 15 दिसंबर 2001 को कांशीराम ने मायावती को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया था. लखनऊ में एक सभा में कांशीराम ने कहा था कि मैं काफी समय से यूपी कम आ पा रहा हूं, लेकिन खुशी की बात यह है कि मेरी इस गैरहाजिरी को कुमारी मायावती ने मुझे महसूस नहीं होने दिया. यह कहते हुए उन्होंने मायावती को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया.
कांशीराम के निर्णय से बसपा के कई नेताओं को झटका लगा था, लेकिन उस वक्त उन सभी ने खामोशी अख्तियार कर रखी. आरके चौधरी और बरखू राम वर्मा जैसे नेता पार्टी में यह संदेश दे रहे थे कि मायावती के साथ उनके मतभेदों के बावजूद अब भी वे कांशीराम के पसंदीदा नेता बने हुए हैं. ऐसे में मायावती ने अपने खिलाफ खड़ी हो रही चुनौती को देखते हुए, उन्हें कांशीराम के हाथों से बाहर निकलवाने का काम किया. इसके बाद मायावती बसपा की 2003 में राष्ट्रीय अध्यक्ष बनी तो फिर पार्टी पर उनका पूरी तरह दबदबा कायम हो गया. कांशीराम के निधन और बसपा की कमान मायावती के हाथों में आने के बाद से मायावती ने अपने खिलाफ पार्टी में किसी तरह की कोई चुनौती को खड़ी होने नहीं दिया.
कांशीराम के साथियों को मायावती ने हाथी से उतारा
कांशीराम के कर्णधारों में राज बहादुर का नाम प्रमुख रहा है, ये कोरी समाज के बड़े नेता रहे हैं. बसपा में उनको छोटे साहब के नाम से पुकारा जाता रहा और सूबे में पार्टी की कमान राज बहादुर के कंधों पर थी. प्रदेश अध्यक्ष पद पर उनके रहते हुए बसपा सूबे की सत्ता पर विराजमान हुई, लेकिन मायावती के दखल पार्टी में बढ़ा तो उन्हें बाहर होना पड़ा. डॉक्टर मसूद अहमद नब्बे के दशक में बीएसपी का मुस्लिम चेहरा थे, लेकिन मायावती के साथ मतभेद होते ही बाहर कर दिए गए. कांशीराम के करीबी रहे सुधीर गोयल को भी बाहर होना पड़ा है.
बरखूराम वर्मा बीएसपी में कुर्मी समाज के बड़े नेता थे. कांशीराम उनके जरिए ओबीसी समाज को बीएसपी से जोड़ने में काफी हद तक कामयाब रहे थे. लेकिन मायावती की नजर टेढ़ी होते ही वे पार्टी से बाहर कर दिए गए. बरखूराम के अलावा कुर्मी नेताओं में राम लखन वर्मा, जंगबहादुर पटेल, आरके पटेल और सोने लाल पटेल भी कांशीराम के दाहिने हाथ माने जाते थे, लेकिन मायावती के प्रकोप से ये भी नहीं बच सके. इसी तरह यूपी के तीन फीसदी पाल समाज के नेता को भी मायावती ने नहीं बख्शा. रमाशंकर पाल, राजा राम पाल, एसपी सिंह बघेल समेत कई नेताओं को बाहर होना पड़ा.
मायावती ने कांशीराम के राइट हैंड माने जाने वाले पंजाब के तेजंद्र सिंह झल्ली और मध्य प्रदेश के दाउ राम रत्नाकर ने जब बसपा में खुद को नंबर दो की पोजिशन पर देखा तो उन्हें मायावती ने पार्टी से एक बाहर निकालने में देर नहीं किया. ऐसे में समझ सकते हैं कि बसपा में नंबर की दो की पोजिशन पर जो भी नेता बैठा है, उसके लिए कांटों भरा ताज से कम नहीं था. मायावती ने अपने समधी अशोक सिद्धार्थ और अपने भतीजे आकाश आनंद को भी नहीं बख्शा.