
विकी कौशल की फिल्म छावा की आजकल खूब चर्चा हो रही है. यह फिल्म छत्रपति शिवाजी महाराज के बड़े बेटे संभाजी राजे पर आधारित है, जो बाद में छत्रपति बने. संभाजी राजे छत्रपति शिवाजी की पहली पत्नी सईबाई के पुत्र थे, जिन्हें शिवाजी छावा (शेर का बच्चा) कहते थे. जबरदस्त प्रतिभा के धनी संभाजी के जीवन काल में एक ऐसा भी वक्त आया था, जब उन्हें शिवाजी के प्रति बागी करार दिया गया था. तब वह किले से भाग निकले थे और औरंगजेब से हाथ मिला लिया था. आइए जान लेते हैं क्या है पूरा किस्सा और मुगलों के साथ का क्या हश्र हुआ?
संभाजी की शिक्षा के लिए शिवाजी ने कई विद्वानों को रखा था. अपनी जबरदस्त प्रतिभा से वह संस्कृत पर जबरदस्त पकड़ रखते थे. केवल नौ वर्ष की आयु में संभाजी को राजनीतिक बंदी के रूप में राजपूत राजा जय सिंह-I के यहां भेजा गया था. तभी का किस्सा है कि औरंगजेब ने बातचीत के बहाने आगरा बुलाया और शिवाजी के साथ ही संभाजी को भी नजरबंद कर लिया था.
शिवाजी ने फैलाई थी संभाजी की मौत की अफवाह
शिवाजी को औरंगजेब ज्यादा समय नजरबंद नहीं रख सका और वह चकमा देकर निकल गए थे. संभाजी उनके साथ ही थे. आगरा से महाराष्ट्र वापसी में शिवाजी ने संभाजी को मथुरा में ही एक रिश्तेदार के यहां छोड़ दिया था. साथ ही उनकी मौत की अफवाह फैला दी थी. मुगल दोनों को खोज रहे थे पर आखिर में उन्हें लगने लगा कि शिवाजी अब उनकी पहुंच में नहीं आएंगे. इस बात का विश्वास हो गया कि संभाजी नहीं रहे तो दोनों की खोज बंद कर दी गई थी. इसके बाद संभाजी को शिवाजी ने सुरक्षित महाराष्ट्र पहुंचने की व्यवस्था की थी.
संभाजी के खिलाफ फैलीं नकारात्मक खबरें
विश्वास पाटिल की किताब महासम्राट और कमल गोखले की किताब शिवपुत्र संभाजी की मानें तो संभाजी को शिवाजी का उत्तराधिकारी माना जाता था. हालांकि, तभी खबरें फैलने लगीं कि उनकी छवि खराब है और वह बागी होते जा रहे हैं. बताया जाता है कि इन खबरों के पीछे संभाजी की सौतेली मां सोयराबाई का हाथ था. वह सिंहासन का उत्तराधिकारी अपने बेटे राजाराम को बनाना चाहती थीं.
सतारा के किले में निगरानी में रखे गए
जेएल मेहता की किताब है, एडवांस्ड स्टडी इन द हिस्ट्री ऑफ मॉडर्न इंडिया. इसमें बताया गया है कि शिवाजी ने संभाजी को बेहतरीन शिक्षा और प्रशिक्षण दिलाया था. इसलिए संभाजी एक अच्छे सैनिक थे. हालांकि, उनके व्यवहार की नकारात्मक खबरें आने पर साल 1678 में छत्रपति शिवाजी ने पन्हाला के किले में संभाजी को निगरानी में रख दिया.
सतारा स्थित इस किले में संभाजी कुछ ही महीने रहे और भाग निकले. यह साल 1678 की बात है. संभाजी ने औरंगाबाद में तैनात मुगल गवर्नर दिलेर खान से हाथ मिला लिया. तब उनकी उम्र 21 साल थी और दिलेर खान उनकी प्रतिभा से वाकिफ था. मराठा साम्राज्य में संभाजी की मजबूत स्थिति को देखते हुए दिलेर खान ने उनको साथ रख लिया. बताया जाता है कि संभाजी करीब एक साल तक मुगलों संग काम करते रहे.
मुगलों का क्रूर व्यवहार रास नहीं आया
साल 1679 में एक ऐसा वाकया हुआ, जिसने संवेदनशील संभाजी को हिला दिया. दरअसल, भूपलगढ़ के किले पर मुगल सेना ने हमला किया था. वहां दिलेर खान और उसके सैनिकों ने आम लोगों के साथ बेहद क्रूरता भरा व्यवहार किया. साथ ही महाराष्ट्र के कई गांवों पर कब्जा कर लिया. संभाजी को यह सब रास नहीं आया.
इसी बीच, संभाजी को औरंगजेब के एक आदेश की भी जानकारी मिल गई, जिसमें उनको गिरफ्तार कर दिल्ली भेजने की बात कही गई थी. इन परिस्थितियों में नवंबर 1679 में संभाजी अपनी पत्नी यशुबाई संग मुगलों को चकमा देकर भाग निकले और बीजापुर पहुंच गए. वहां से दिसंबर के शुरू में वे पन्हला पहुंच गए, जहां शिवाजी महाराज से उनकी काफी गर्मजोशी से मुलाकात हुई थी.
ऐसे में संभाजी जब औपचारिक तौर पर 20 जुलाई 1680 को छत्रपति बने तो पिता शिवाजी महाराज की ही तरह मुगलों का सामना करते रहे. औरंगजेब को तो उन्होंने नाकों चने चबवा दिए थे. अगर अपने ने धोखा न दिया होता तो शायद ही औरंगजेब कभी संभाजी को पकड़ पाता और उनकी हत्या कर पाता.