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राहुल-प्रियंका के फ्लॉप होने पर सोनिया कोपार्टी बचाने के लिए अब पीके से आस

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नई दिल्‍ली। गैंग्स ऑफ वासेपुर का एक चर्चित डॉयलॉग है, जिसमें रमाधीर सिंह अपने बेटे से कहता है- तुमसे ना हो पाएगा। कांग्रेस पार्टी के मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य को देखकर यह एकदम प्रासंगिक लगता है। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी भी एक तरह से अपने बेटे राहुल गांधी को देखकर ऐसी ही सोचती होंगी कि बेटा तुमसे ना हो पाएगा। अपने बेटे राहुल गांधी और बेटी प्रियंका गांधी वाड्रा के चुनाव दर चुनाव फ्लॉप प्रदर्शन से निराश सोनिया गांधी की एकमात्र आस अब प्रशांत किशोर यानी पीके पर जा टिकी है। किसी भी तरह सत्ता पाने की चाह में सोनिया गांधी पीके को पार्टी में शामिल करना चाहती है। पीके को लेकर कांग्रेस में हलचल मची हुई है। पिछले चार दिनों से पीके सोनिया गांधी से कई बार मिल चुके हैं। पीके ने सोनिया गांधी के सामने 2024 के आम चुनावों के लिए एक रोड मैप के साथ एक विस्तृत प्रेजेंटेशन दी है। पार्टी में दोबारा जान डालने के लिए बनाए गए इस प्रेजेंटेशन में 600 स्लाइडें हैं। इन स्लाइडों में चुनाव जीतने के लिए कई तरह के सुझाव दिए गए हैं। बताया जा रहा है कि पीके ने गांधी परिवार को कांग्रेस में फिर से जान फूंकने के लिए जो प्लान दिए हैं, राहुल गांधी उससे सहमत हैं।

आखिर ऐसा क्या है जो सोनिया गांधी अब राहुल-प्रियंका से नाउम्मीद हो चुकी हैं और इन दोनों के भरोसे नहीं रहना चाहती हैं…

कांग्रेस का तुरुप का आखिरी पत्ता भी फेल
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को अब तक के सबसे खराब नतीजों का सामना करना पड़ा है। अपने बेटे राहुल गांधी को राजनीति में जमाने में नाकाम रहने पर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने पार्टी पर परिवार का नियंत्रण बनाए रखने के लिए बेटी प्रियंका गांधी वाड्रा के रूप में अपना ब्रह्मास्त्र छोड़ा। लेकिन यूपी में सोनिया का ब्रह्मास्त्र फुस्स रह गया। राहुल गांधी के नेतृत्व में साल 2012 से ही कांग्रेस को मिल रही लगातार हार के बाद गांधी परिवार की आखिरी उम्मीद प्रियंका गांधी वाड्रा पर आ टिकी थी। पार्टी के चाटुकारों ने दादी इंदिरा गांधी से तुलना कर प्रियंका को झाड़ पर चढ़ा दिया। पर्दे के पीछे से परिवार की राजनीति करने वाली प्रियंका गांधी वाड्रा साल 2019 में राष्ट्रीय महासचिव बना दी गईं। पार्टी के बिना जनाधार वाले नेताओं और पक्षकारों ने ये माहौल बनाने की कोशिश की कि प्रियंका कांग्रेस के डूबते हुए जहाज को किनारे लगा देंगी, लेकिन 2022 के चुनाव ने सोनिया गांधी के साथ सभी के उम्मीदों पर पानी फेर दिया। कांग्रेस का तुरुप का पत्ता पहले ही दांव में बेकार चला गया। राहुल के बाद लोगों में प्रियंका वाड्रा को लेकर जो भ्रम बना हुआ था वो टूट गया।

प्रियंका को चुनाव में मिली पूरी छूट, पर रही नाकाम
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में सब कुछ प्रियंका गांधी वाड्रा के मन मुताबिक हुआ। चुनाव अभियान का पूरा नियंत्रण प्रियंका के हाथों में था। दिल्ली से लेकर लखनऊ तक किसी नेता का कोई दखल नहीं था। टिकट बंटवारे से लेकर रोड शो और रैली तक सब कुछ प्रियंका के निर्देश पर हुआ। सोनिया गांधी ने भी अपने सारे सितारे प्रियंका के साथ लगा दिए थे। राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, छत्तीसगढ़ के सीएम भूपेश बघेल और सचिन पायलट सहित कई बड़े नेताओं ने यूपी में आकर रैलियां की। कांग्रेस के पक्ष में हवा बनाने की कोशिश की गई। खुद प्रियंका ने राज्य में 167 रैलियां और 42 रोड शो किए। कुल 209 रैलियां और रोड शो के बाद भी प्रियंका का जादू नहीं चला। कांग्रेस के 403 उम्मीदवारों में से सिर्फ दो ही जीत पाने में कामयाब रहे। चुनाव में कांग्रेस का वोट प्रतिशत 6.2 प्रतिशत से घटकर 2.3 प्रतिशत पर आ गया।

सिर्फ दो राज्यो में सिमट कर रह गई कांग्रेस
सोनिया गांधी, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा के भरोसे रहने वाली कांग्रेस अब सिर्फ दो राज्यों में सिमट कर रह गई है। अब सिर्फ राजस्थान और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सरकार है। महाराष्ट्र में शिवसेना और एनसीपी के साथ सरकार में भागीदार है। पार्टी पर परिवार की पकड़ के कारण जनाधार वाले नेताओं की पूछ नहीं हो रही है। उत्तर प्रदेश में ही प्रियंका वाड्रा के कारण कई पुराने और जनाधार वाले नेता पार्टी छोड़ने के लिए मजबूर हो गए। आरपीएन सिंह, जितिन प्रसाद, ललितेश त्रिपाठी सहित करीब 40 नेताओं ने पार्टी को बॉय बोल दिया।

राहुल-प्रियंका के सियासी भविष्यपर सवाल
साफ है कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की परिवार के बल पर पार्टी चलाने की कोशिश सफल नहीं हो पा रही है। राहुल गांधी को वर्ष 2012 के बाद से ही भावी प्रधानमंत्री के रूप में पेश किया जाता रहा है। लेकिन चुनावों में लगातार खराब प्रदर्शन के कारण यूपीए के नेताओं ने राहुल को प्रधानमंत्री उम्मीदवार के रूप में खारिज करना शुरू कर दिया। ऐसे में प्रियंका को आगे बढ़ाया गया, लेकिन 2019 लोकसभा चुनाव के बाद प्रियंका गांधी को ये दूसरी बड़ी हार मिली है। पंचायत चुनाव में भी पार्टी का प्रदर्शन काफी खराब रहा है। यहां तक की पारंपरिक गढ़ अमेठी और रायबरेली में भी वोटरों ने परिवार को नकार दिया। प्रियंका के आने के बाद भी पार्टी के कुछ खास ना कर पाने से उसके सियासी भविष्य ही सवाल उठने लगे हैं।

परिवारवाद के साये में पार्टी
सोनिया गांधी ने भले ही कांग्रेस पर अपनी लगाम कस दी हो, लेकिन आज स्थिति ये है कि पार्टी परिवारवाद के साये में पूरी तरह घिर चुकी है। अवसर की तलाश में युवा नेता पार्टी छोड़कर जा रहे हैं। वंशवाद की राजनीति के इस ढांचे में कांग्रेस के अनुभवी नेता भी सरेंडर कर चुके हैं। नेहरू-गांधी परिवार इनके दिमाग पर राज करे, इसे शायद ये अपनी नियति मानकर चलते हैं। क्योंकि पार्टी के कई वरिष्ठ नेता अतीत में नेहरू-गांधी परिवार के कदम के विरोध में आवाज उठाने वाले नेताओं का हश्र देख चुके हैं।

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