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भारत का पहला विदेशमंत्री जो दिग्‍गज देशों में घुसकर सर्जिकल स्ट्राइक करके आता है

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नई दिल्‍ली। आमतौर पर देशवासियों का ध्यान प्रधानमंत्री, गृहमंत्री, शिक्षा मंत्री, सड़क परिवहन मंत्री जैसे दिग्‍गज मंत्रियों पर केन्द्रित रहता है क्‍योंकि ये तमाम मंत्री देश के बड़े राजनेता रहे हैं। लेकिन इन सभी से हटकर हमारे विदेशमंत्री एस जयशंकर बिना शोर मचाये इन दिनों ऐसा धमाल मचाए हुए है जिससे पूरी दुनिया में भारत की एक अलग पहचान बन रही हैं।

आज जो पूरी दुनिया में भारत की कूटनीति का जो लोहा माना जा रहा है, उसके पीछे जयशंकर जी का अथक परिश्रम है। आज तक हमारे जितने भी विदेशमंत्री रहे, वो सब राजनेता होते थे। लेकिन पहली बार 2019 में प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी ने सुब्रमण्यम जयशंकर को विदेशमंत्री बनाया जिन्हें भारतीय विदेश सेवा में रहते हुए विदेश नीति का 40 साल का लंबा अनुभव है।

यूएस, सिंगापुर, चीन आदि देशों में भारत के राजदूत रह चुके हैं जयशंकर

जब 2019 में जीतने के बाद नरेन्‍द्र मोदी के शपथ ग्रहण वाले दिन राष्ट्रपति भवन में एस जयशंकर को शपथ लेने वाले मंत्रियों के साथ बैठे देखा, तो किसी को विश्वास नहीं हुआ कि एक राजनयिक नौकरशाह  को विदेश मंत्री बनाया जा रहा है क्योंकि आमतौर पर हमारे यहाँ मंत्री तो राजनेता ही बनते हैं। लेकिन पीएम मोदी ने उनके अंदर छुपी हुई प्रतिभा को पहचानकर उन्हें इतना बड़ा पद दिया।

पहले कोरोना काल में की गई वैक्‍सीन डिप्लोमेसी और अब यूक्रेन-रूस युद्ध के समय भारत द्वारा की जा रही सधी हुई कूटनीति को देखकर पता चलता है कि मोदीजी का चयन कितना सही था। जब जयशंकर राजनयिक थे, तब उन्हें हर बात के लिए सरकार के ठप्पे की ज़रूरत होती थी। वैसे भी विदेशनीति में एक-एक शब्द को तोल-मोलकर बोलना, लिखना होता है, हर बात में औपचारिकताओं को देखा जाता है, लेकिन जब जयशंकर विदेशमंत्री बने, और मोदीजी ने उन्हें फ्री हैंड दिया तो अब वो जहाँ भी जाते हैं, चौके-छक्के लगाकर आते हैं।

हद तो तब हो गई कि जब उन्‍होंने अमेरिका में जाकर अमरीकियों को ही पेल दिया। अमेरिकी मीडिया ने हमेशा की तरह भारत में मानवाधिकार का रोना रोया, उम्मीद ये थी कि पहले जैसा होता था वैसे ही भारत रक्षात्‍मक मुद्रा में आ जाएगा। लेकिन जयशंकर ने अमरीकी पत्रकार से पलटकर कहा लोग हमारे बारे में क्या राय रखते हैं, ये उनका अधिकार है।  लेकिन उनकी राय के बारे में उन गुटों और वोट बैंक जो ऐसे मुद्दों को खींचकर लाते हैं, उनके बारे में राय रखने का हमें भी पूरा अधिकार है।

उसके बाद जयशंकर ने कहा और रही बात मानवाधिकारों की  तो दूसरे देशों के लोगों के मानवाधिकारों के बारे में हमारे भी विचार होते हैं, अमेरिकी लोगों के मानवाधिकारों समेत।

बल्कि यहाँ तो कल ही एक मानवाधिकार सम्बंधित घटना घटी थी। विश्वास कीजिए, हम भविष्य में होने वाली मीटिंग्स में ये सभी मुद्दे उठाते रहेंगे। इस जवाब को सुनकर अमेरिकी रिपोर्टरों को तो साँप सूँघ गया।

उन्होंने एक दम से सवाल बदलकर पूछा कि रूस से हथियार खरीदने के कारण यदि अमेरिका अपने CAATSA कानून के तहत भारत पर sanctions लगा दे तो?

जवाब मिला: CAATSA अमेरिका का कानून है। वो इसे कैसे और किसके खिलाफ इस्‍तेमाल  करें, ये उसे तय करना है। लेकिन ये रंग सिर्फ अमेरिका में ही नहीं जमा, अभी पिछले सप्ताह ही ब्रिटेन की विदेशमंत्री भारत आईं थीं। उनका उद्देश्य था भारत को रूस से तेल आयात न करने के लिए मनाना। प्रेस कॉन्फ्रेंस शुरू हुई तो पत्रकारों ने प्रश्न पूछा, जिसके उत्तर में जयशंकर ने कहा- मुझे विश्वास है कि कुछ महीने बाद यूरोप के सारे देश रूस से पहले जितना ही तेल लेने लग जाएंगे, इतने प्रतिबंधों  के बावज़ूद भी यूरोप  ने मार्च में 15 फीसदी अधिक तेल  और गैस रूस से खरीदा है। रही बात भारत की तो यदि हमें अपनी जनता के लिए सस्ता तेल मिल रहा है तो हम क्यों न खरीदें?

बराबर में बैठी बेचारी ब्रिटिश विदेशमंत्री सब सुनती रही, फिर एक पत्रकार के प्रश्न के जवाब में बोली- भारत एक स्वतंत्र देश है, किससे क्या खरीदना है ये खुद भारत ही तय करेगा। मैं भारत को कुछ सीख देने नहीं, बल्कि यहाँ भारत से संबंध मज़बूत करने आई हूँ।

रूस से तेल आयात के बारे में अमेरिका में भी प्रश्न पूछा गया था। वहाँ जयशंकर ये कह आये कि आपके यूरोपियल  मित्र जितना तेल एक दिन  में रूस से खरीद लेते हैं उतना तो भारत एक महीने में भी नहीं खरीदता। इसके बाद अमेरिकी पत्रकारों की बोलती बंद हो गई और तेल व गैस खरीद के मुद्दे पर भारत को रूस से अलहदा करने की अमेरिकी साजिश सिर्फ विदेश में जयशंकर की निर्भीक हाजिर जवाबी से धरी रह गई।

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