Breaking News
Home 25 देश 25 खालिस सोच के धनी गुरू के संघर्षों का अमृत महोत्सव

खालिस सोच के धनी गुरू के संघर्षों का अमृत महोत्सव

Spread the love
डॉ0 मार्कण्डेय आहूजा

चिड़ियों से मैं बाज लड़ाऊँ, गीदडाँ से मैं शेर लड़ाऊँ, सवा लाख से एक लड़ाऊँ ऐसे दूरदृष्टा, साहसी, आत्मविष्वास से लबालब एक महान सेनानायक, वीर क्रान्तिकारी, स्वतन्त्रताप्रिय देशभक्त, श्रेष्ठ समाज सुधारक जिन्होंने देश, धर्म, समाज और स्वतन्त्रता के लिए अपने पिता और पुत्रों को भी सर्वोच्च बलिदान के लिए प्रेरित किया। दो साहिबजादे चमकौर की जंग में और दो दीवारों में चिने गए और उफ भी न की बल्कि मुख से निकला, ‘‘चार मुअे तो क्या हुआ, जीवित कई हजार’। अपनी प्रजा को ही पुत्र मानने वाले ऐसे महान् राजनायक सन्त शिरोमणि के बलिदानों की कहानी का ही है हमारा अमृत महोत्सव। उन्होंने समाज को संगठित करके सैनिक परिवेष में ढाला और उनमें नेतृत्व करने वाले ‘सरदार’ की शक्ति उत्पन्न की और उनके नाम के साथ शक्ति का सूचक सिंह शब्द भी लगाने का निर्देश दिया। इसके साथ ही पंच ‘ककार’ – केश, कंघा, कच्छा, कड़ा, कृपाण भी अनिवार्य किया।

गुरु गोविन्द सिंह को बचपन में ‘बाला प्रीतम’ पुकारा जाता था। उनके मामा उन्हें प्रभु कृपा मानकर गोविन्द कहते थे और बार-बार गोविन्द कहने से बाला प्रीतम का नाम गोविन्द राय पड़ा। बचपन में सुन्दर, फुर्तीले और हंसमुख होने की वजह से सभी का प्यार पा लेते थे और खिलौनों की उम्र में कृपाण, कटार और धनुषबाण से खेलते बालक गोविन्द की शरारतों में भी कोई न कोई सबक होता था जैसे भगवान् कृष्ण की लीलाओं के पीछे के रहस्य को गीता मनीषी स्वामी ज्ञानानन्द उद्भासित करते रहते हैं। गोविन्द एक निसंतान बुढ़िया को बार-बार परेषान करते जो सूत कातकर अपना गुजारा करती थी। गोविन्द उसकी पूनियाँ बिखेर देते और वह बुढ़िया माता गुजरी के पास शिकायत करती और माता उसे पैसे देकर खुष कर देती माता ने एक बार गोविन्द से बुढ़िया को तंग करने का कारण पूछा तो उन्होंने सहज भाव से कहा, ‘‘उसकी गरीबी दूर करने के लिए क्योंकि यदि मैं उसकी पूनियाँ नहीं बिखेरूंगा तो उसे पैसे कैसे मिलेंगे।

यह है गोविन्द की बचपन से ही संवेदना से भरे होने का लक्षण। एक महान् नेता का एक महत्वपूर्ण गुण होता है-लगातार अपनी स्वयं की धार को तेज करते रहना यानि अपने ज्ञान की वृद्धि करते रहना । अतः गद्दी पर बैठने के पष्चात् जब उन्हें अपने कर्तव्य और दायित्व का बोध हुआ तो उन्होंने संस्कृत, फारसी, पंजाबी और अरबी भाषाएं सीखी और न केवल स्वयं ही अस्त्र-शस्त्र की शिक्षा ली अपितु अन्य लोगों को भी अस्त्र-शस्त्र चलाना सिखाया और उन्हें अपनी मातृभूमि, अपने धर्म और स्वयं अपनी रक्षा करने के लिए संकल्पबद्ध किया और मानवता का पाठ पढ़ाया। इतना ही नहीं गुरु गोविन्द सिंह का व्यक्तित्व अदम्य साहस से भरा था।

औरंगजेब ने जब आनन्दपुर साहिब का घेराव छः महीने से भी अधिक रखा तब उसके सेनापति पाइदा खां ने कहा कि, ‘‘मैं अकेले गोविन्द सिंह से युद्ध करूंगा और दोनों की हार-जीत से ही फैसला माना जाये,’’ अगले दिन दोनों योद्धा रणभूमि में मौजूद थे और दोनों की सेनायें पीछे थी। न्यायप्रिय गोविन्द सिंह ने पाइंदा खां से कहा कि चूंकि चुनौती तुमने दी है, इसीलिए पहला वार तुम ही करो। अचूक निशानची पाइंदा खां खुष था कि उसका वार ही पहला और आखिरी भी होगा। उसने धनुष पर तीर चढ़ाकर छोड़ा तो गुरुजी ने उसका बाण बीच में ही काट दिया और तब गुरुजी ने अपनी बारी आने पर पहले ही तीर से पाइंदा खां का सिर धड़ से अलग कर दिया।

कूटनीति के तहत जब गुरु गोविन्द सिंह ने आनन्दपुर साहिब छोड़ा तो कुछ ही दूरी पर मुगलों ने उन पर हमला कर दिया। माता गुजरी और दो छोटे बच्चों ने सरहिन्द में शरण ली परन्तु उनके रसोइए गंगू ने लालचवष उन्हें वजीर खां के हवाले कर दिया। एक तरफ वजीर खां ने बच्चों जोरावर सिंह व फतेह सिंह को दीवार में जिन्दा चिनवा दिया और दूसरी तरफ चमकौर युद्ध में दो बेटे अजीत सिंह और जुझार सिंह शहीद हो गए। तत्पष्चात् गुरूजी ने औरंगजेब को एक पत्र जफरनामा (विजय की चिट्ठी) लिखा, जिसमें उन्होंने औरंगजेब को चेतावनी दी कि तेरा साम्राज्य नष्ट करने के लिए खालसा पंथ तैयार हो गया है। 8 मई 1705 में मुक्तसर में मुगलों से भयानक युद्ध हुआ जिसमें गुरूजी की जीत हुई। 1706 में गुरूजी दक्षिण में गये जहां पर उन्हें औरंगजेब की मुत्यु का पता चला। मरते समय औरंगजेब ने एक षिकायत पत्र लिखा। आष्चर्य की बात है कि जो सब कुछ लुटा चुका था (गोविन्द) वो फतहनामा लिख रहे थे और जिसके पास सब कुछ था वह षिकस्तनामा लिख रहा था। इसका कारण था निष्ठा व सच्चाई। गुरूजी ने सदैव आतंक एवं अत्याचार, अनाचार व दुराचार के विरुद्ध युद्ध किए थे न कि अपने निजी लाभ के लिए यानि गुरू जी की जीवन यात्रा स्वार्थ नहीं परमार्थ की थी। गुरू जी के बारे मेें ‘पूर्ण पुरुष’ पुस्तक लिखने वाले दौलतराय जो कि कट्टर आर्य समाजी थे, लिखते हैं, ‘‘मैं चाहता तो स्वामी विवेकानन्द, स्वामी दयानन्द, स्वामी रामकृष्ण परमहंस के बारे में काफी कुछ लिख सकता था परन्तु मुझे पूर्ण पुरूष के सम्पूर्ण गुण गुरू गोविन्द सिंह में मिले। मोहम्मद लतीफ लिखते हैं कि जब मैं गुरू जी के व्यक्तित्व के बारे में सोचता हूं तो मुझे समझ में नहीं आता कि उनके किस पहलू का वर्णन करूँ। वे कभी मुझे महाधिराज, कभी महादानी, कभी फकीर नजर आते हैं और कभी वे गुरू नजर आते हैं। सच में गुरू जी की जीवन यात्रा सकारात्मकता, साहस, संवेदना, संकल्प, सत्य, सुच्चरित्र और धर्म के प्रति समर्पण और नई एवं अलग सोच की यात्रा है उन्हीं की इस खालिस सोच की स्मृति का है

स्वतन्त्रता का अमृत महोत्सव।
संत वे योद्धा वे, गृहस्थी में संन्यासी थे
महापुत्र वे महापिता वे, राष्ट्रपिता संत सिपाही थे
पंथ खालसा के निर्माता, न्याय-सत्य के राही थे
स्वतन्त्रता के अमृत महोत्सव में
उनके बलिदानों की गाथा
लिखें खून की स्याही से

(लेखक हरियाणा, विश्व संवाद केन्द्र के अध्यक्ष हैं )

About admin

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*