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बिहार में शराबबंदी की खुली पोल, नकली शराबकांड में 35 मौतें, सियासी हडकंप मचा

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पटना। बीते कुछ दिनों में बिहार में जहरीली शराब पीने से लगातार लाेग मर रहे हैं जिनकी संख्या बढ़कर 35 हो गई है। अब इस मुद्दे पर खूब हो-हंगामा मचा तो बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने उच्च स्तरीय बैठक बुलाकर मामले की समीक्षा की। नीतीश कुमार ने हाल ही में हुई जहरीली शराब की घटनाओं के संबंध में अधिकारियों को सख्त कार्रवाई करने का निर्देश दिया। लेकिन सवाल है कि जब बिहार में शराबबंदी लागू है तो शराब पीने-पिलाने का यह सिलसिला रूक क्यों नहीं रहा?

क्या नीतीश कुमार के राज में शराबबंदी की पोल खुल रही है? विपक्षी नेता और सामाजिक संगठन मानते हैं कि सरकार के दावों से उलट शराबबंदी पर जमीनी सच्चाई कुछ और ही है। इसी साल फरवरी में सरकार में मंत्री मुकेश सहनी ने इस कानून पर सवाल उठाते हुए कहा था कि बिहार में सात हजार करोड़ रुपये का सालाना नुकसान होने के बाबजूद शराबबंदी कानून सख्ती से लागू नहीं किया जा रहा है।

शराबबंदी के बाद बिहार में हड़कंप (फाइल फोटो)

हालांकि सामाजिक टिप्पणीकार इस पर एक अलग राय कहते हैं और मानते हैं कि दुनिया में कहीं भी इस तरह के कड़े शराबबंदी कानून सफल नहीं हुए हैं। शराब पीने की आदत पर केवल अंकुश लगाया जा सकता है लेकिन कानूनों के माध्यम से रोका नहीं जा सकता है। बिहार सरकार इस समस्या को सामाजिक समस्या की तरह नहीं ले रही है, इसलिए लोग जहरीली और नकली शराब पीने को मजबूर हो रहे हैं।  

शराबबंदी कब से लागू है
बिहार में 2015 के विधानसभा चुनाव के दौरान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने महिलाओं से वादा किया था राज्य में शराबबंदी लागू की जाएगी। इसका एक उद्देश्य घरेलू हिंसा को रोकना था, जिसे अक्सर शराब पीने से जोड़ कर देखा जाता रहा है। चुनाव में जीत हासिल करने और लगातार तीसरी बार मुख्यमंत्री बनने के बाद कुमार ने महिलाओं से किया वादा निभाया और एक अप्रैल 2016 बिहार निषेध एवं आबकारी अधिनियम के तहत बिहार में शराबबंदी लागू कर दी गई।

कानून का उल्लंघन करने पर कम से कम 50,000 रुपये जुर्माने से लेकर 10 साल तक की सजा का प्रावधान है। रिपोर्टों के मुताबिक, बिहार को शराब बिक्री पर लगे टैक्स कलेक्शन से हर साल 4,000 करोड़ रुपये की आमदनी हो रही थी। राज्य सरकार ने राजस्व के इस नुकसान का अनुमान लगा लिया था। राज्य सरकार ने कानून लागू करते समय कहा था कि वह इसकी भरपाई के लिए वित्त और संसाधनों का बेहतर प्रबंधन करेगी।

नकली शराब बनाने का धंधा चल निकला
इस कानून के लागू होने के एक महीने बाद ही मई 2016 में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा शराबबंदी के कारण अपराध में कमी आई है। लेकिन दूसरी तरफ आरोप यह लगने लगे कि पुलिस और प्रशासन की नाक तले राज्य में नकली शराब का धंधा चल निकला। 31 अक्तूबर 2021 तक 70 लोग, जिनमें ज्यादातर समाज के निचले तबके के थे, तस्करी करके लागए गए नकली और जहरीली शराब के सेवन से मारे गए। नकली शराब की वजह से गोपालगंज और पश्चिमी चंपारण जिलों में दो दर्जन से अधिक परिवारों के लिए यह दिवाली काली हो गई। 

मीडिया रिपोर्टस के मुताबिक राज्य के आबकारी विभाग के आंकड़ों के अनुसार, शराब बंदी से पहले, बिहार में हर महीने करीब 2.5 करोड़ लीटर शराब की खपत होती थी। जानकार बताते हैं कि शराबबंदी के बाद से ही राज्य में अवैध शराब का धंधा जोर-शोर से शुरू हो गया। चुनाव के समय यह धंधा और जोर पकड़ लेता है।  बताया जा रहा है कि झारखंड में कुछ शराब की नकली फैक्ट्रियां चल रही हैं, जहां से केवल बिहार में सप्लाई की जाती है। उन फैक्ट्रियों में बनने वाली अधिकांश शराब नवादा के रास्ते बिहार में पहुंचती है। 

शराब की तस्करी

टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज के एक प्रोफेसर ने बताया बिहार में शराबबंदी कानून के साथ समस्या यह है कि शराब को कानून और व्यवस्था के विषय के रूप में देखा जा रहा है न कि सामाजिक समस्या के। जबकि सरकार को इस पर अधिक जन जागरूकता अभियान चलाने, संबंधित हितधारकों से परामर्श करने, नशामुक्ति केंद्र आदि स्थापित करने पर ध्यान देना चाहिए था। राज्य सरकार की जिम्मेदारी शराब पर प्रतिबंध लगाने तक ही सीमित नहीं है बल्कि उसे समाज की विभिन्न तबकों के बारे में सोचना चाहिए।

तस्करी के लिए नए-नए तरीके
माना जा रहा है कि आज प्रदेश में शराब का अवैध व्यापार सबसे अधिक लाभदायक व्यवसाय बन गया है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक बिहार में तस्करी करके लाई जा रही शराब लगभग रोजाना पकड़ी जाती है। 2020 में बिहार में हर एक मिनट में कम से कम तीन लीटर शराब बरामद किया गया और 10 मिनट के अंदर एक गिरफ्तारी भी हुई। अपराधियों ने शराब की बोतलों की तस्करी के लिए नए-नए तरीके अपनाए हैं।

वे कोड वर्ड का इस्तेमाल करते हैं जैसे एक चौथाई के लिए चवन्नी आधी बोतल के लिए अठन्नी। तस्कर गैस सिलेंडरों के अंदर, फलों और अनाज की टोकरी से लेकर एम्बुलेंस और ट्रेनों की पेंट्री कारों तक के जरिए अवैध शराब का धंधा कर रहे हैं। पेंट्री कारों में काम करने वाले कई रेलवे कर्मचारियों को अवैध व्यापार में शामिल होने के आरोप में गिरफ्तार किया गया है।

शराब (प्रतीकात्मक फोटो)

इतना ही नहीं शराब माफिया के हौसले इतने हैं कि वो पुलिस पर गोली चलाने, हमला करने और उनकी हत्या करने से भी गुरेज नहीं करते हैं। इसी साल की शुरुआत में सीतामढ़ी में शराब माफिया ने एक दारोगा की गोली मारकर हत्या  कर दी। वहीं कहीं ना कहीं से शराब माफियाओं का पुलिस पर हमले की खबरें भी आती रहती हैं।

पहली बड़ी घटना कब हुई
एक अप्रैल 2016 में शराबबंदी कानून लागू होने के बाद अगस्त में गोपालगंज जिले के खजुर्बनी गांव में 19 लोगों की जहरीली शराब पीने से मौत हो गई थी। कानून लागू होने के बाद यह पहली बड़ी घटना थी। अधिकारी गोपालगंज पहुंचे और स्थानीय प्रशासन ने अवैध शराब के धंधे में शामिल लोगों के खिलाफ कार्रवाई शुरू कर दी। घटना के पांच साल बाद, मार्च 2021 में, 13 आरोपियों को इस मामले में दोषी ठहराया गया था, जिसमें नौ को मौत की सजा और चार को उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी। हालांकि जानकार बताते हैं कि बिहार में नकली शराब का धंधा चल रहा है और उसे पीने से लोगों की मौतें भी हो रही हैं। 

जब से बिहार एक ‘ड्राइ स्टेट’ बना है, अब तक 125 लोग अवैध शराब पीने से मारे गए हैं, जिनमें से 70 से ज्यादा मौतें इस साल 31 अक्तूबर तक हुई हैं। इस साल और पिछले साल कोरोना महामारी के कारण लॉकडाउन के बावजूद, राज्य में अवैध शराब की आपूर्ति ने कई लोगों की जान ले ली। पुलिस रिकॉर्ड से पता चलता है कि इस साल जनवरी से 26 अगस्त तक नवादा, पश्चिमी चंपारण, मुजफ्फरपुर और रोहतास जिलों में कथित रूप से जहरीली शराब पीने से 64 लोगों की मौत हो गई और कई लोगों की आंखों की रोशनी चली गई।

जिन जिलों से नकली शराब पीने से सबसे ज्यादा मौतें हुई हैं, वे हैं गोपालगंज, पश्चिम चंपारण, मुजफ्फरपुर, नवादा, सीवान, वैशाली, कैमूर, बेगूसराय और रोहतास। इनमें से अधिकांश जिलों की उत्तर प्रदेश, झारखंड और नेपाल के साथ सीमाएं साझा लगती हैं जहां अवैध शराब का व्यापार फल-फूल रहा है। 

गोपालगंज के एक सामाजिक कार्यकर्ता ने बताया ज्यादातर मामलों में,  सरकार जहरीली शराब को मौत का कारण मानने से इंकार कर देती है वहीं मृतक के परिवार के सदस्य भी मुआवजे का लाभ उठाने और दबाव के कारण अपना बयान बदल देते हैं। लेकिन इलाके की हकीकत सभी जानते हैं। 

हालांकि पुलिस-प्रशासन का दावा है कि शराबबंदी कानून लागू होने के बाद हजारों लीटर शराब जब्त की गई है लेकिन नए शराबबंदी कानून के तहत केवल कुछ को ही दोषी ठहराया गया। इसके लिए पुलिस, आबकारी अधिकारियों, स्थानीय अपराधियों और राजनेताओं के बीच सांठगांठ के आरोप लगते रहे हैं। कई पुलिसकर्मियों को निलंबित भी किया गया क्योंकि उनमें से कुछ पुलिसकर्मियों पर जब्त शराब की बोतलों को बेचने के आरोप थे।

नवंबर 2019 में पटना हाई कोर्ट ने कहा था कि शराबबंदी कानून के उल्लंघन से जुड़े करीब दो लाख से ज्यादा मामले बिहार की अदालतों में लंबित पड़े हैं जो न्यायपालिका पर अतिरिक्त दबाव है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, निचली अदालतों में कुल लंबित मामलों में से लगभग 25 प्रतिशत और उच्च न्यायालय में 20 प्रतिशत शराबबंदी से संबंधित मामले हैं।
 

तेजस्वी यादव – फोटो : पीटीआई
राजद का आरोप
मुख्य विपक्षी राष्ट्रीय जनता दल  के नेता तेजस्वी यादव ने मुख्यमंत्री पर उन पुलिस अधिकारियों और मंत्रियों को संरक्षण देने का आरोप लगाया है जो बीते 30 अक्टूबर को हुए उपचुनाव के दौरान अवैध शराब के वितरण में शामिल थे। यादव ने ट्वीट कर कहा था “नीतीश कुमार के संरक्षण में मंत्रियों और पुलिस अधिकारियों ने उपचुनाव के दौरान खुद शराब बांटी। बंदी कहां है? ऐसी मौतों का जिम्मेदार कौन?  बिहार में 20 हजार करोड़ की अवैध शराब की तस्करी और समांतर ब्लैक इकॉनमी के सरगना सामने आकर इसका जवाब दें।

एक दूसरे ट्वीट में तेजस्वी यादव ने  मुख्यमंत्री का वीडियो क्लिप साझा करते हुए कहा ‘नीतीश कुमार के राज में पिछले तीन दिनों में ही जहरीली शराब से 50 से अधिक मौतें हो चुकी है। मुख्यमंत्री स्वयं, प्रशासन, माफिया और तस्कर पुलिस पर कारवाई करने के बजाय पीने वालों को कड़ा सबक सिखाने की धमकी देते रहते है।’

राजद के वरिष्ठ नेता शिवानंद तिवारी ने एक बयान में कहा, ‘नकली शराब के सेवन से होने वाली मौतें अब छोटी प्रकृति की महामारी में बदल गई हैं। लोग मर रहे हैं और स्थानीय प्रशासन पीड़ितों के परिवार के सदस्यों पर दबाव डालकर बिना पोस्टमार्टम के मरने वालों का अंतिम संस्कार करने में लगा हुआ है ताकि किसी को हताहतों की सही संख्या का पता न चले। कोई नहीं जानता कि नीतीश कुमार के हठ के कारण और कितने लोग मरेंगे।

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